Kohramlive : पुराने गांवों और कस्बों के घरों को अगर आपने कभी गौर से देखा हो, तो एक बात जरूर ध्यान दी होगी, घर के मुख्य दरवाजे के सामने बना ऊंचा चबूतरा। आधुनिक मकानों के दौर में यह धीरे-धीरे गायब हो गया है, लेकिन एक समय ऐसा था जब चबूतरे के बिना घर अधूरा माना जाता था। दरअसल, चबूतरा केवल बैठने की जगह नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन, पारिवारिक व्यवस्था और घर की सुरक्षा का अहम हिस्सा हुआ करता था। आइये जानते हैं, आखिर इसके पीछे क्या सोच थी।
शाम ढलते ही सज जाती थी छोटी-सी चौपाल
उस दौर में न मोबाइल थे, न सोशल मीडिया और न ही हर घर में TV। दिनभर का काम खत्म होने के बाद गांव के लोग घर के बाहर बने चबूतरे पर जुटते थे। यहीं बैठकर खेती-किसानी, गांव की खबरें, रिश्ते-नाते और देश-दुनिया की बातें होती थीं। कह सकते हैं कि चबूतरा गांव की सबसे छोटी और सबसे जीवंत चौपाल हुआ करता था।
घर की मर्यादा और निजता का रखवाला
जब कोई बाहरी व्यक्ति या मेहमान घर आता था, तो उसे सीधे घर के भीतर नहीं ले जाया जाता था। पहले चबूतरे पर ही बैठाकर बातचीत होती थी। इससे घर की महिलाओं की निजता बनी रहती थी और उन्हें अपने कामकाज में बाधा नहीं आती थी। उस समय के सामाजिक परिवेश में यह व्यवस्था बेहद व्यावहारिक मानी जाती थी।
महिलाओं का अपना खुला आंगन
चबूतरा केवल पुरुषों की बैठक नहीं था। महिलायें भी यहीं बैठकर अनाज साफ करती थीं, सब्जियां चुनती थीं, सर्दियों की धूप सेंकती थीं और पड़ोस की महिलाओं के साथ सुख-दुख बांटती थीं। यह घर के रोजमर्रा के जीवन का सबसे सक्रिय हिस्सा हुआ करता था। चबूतरे का एक बड़ा व्यावहारिक फायदा भी था। घर का फर्श जमीन से ऊंचा होने के कारण बारिश का पानी और कीचड़ सीधे घर में नहीं घुसता था। वहीं, सांप, बिच्छू और अन्य रेंगने वाले जीवों के घर में आने की संभावना भी कम हो जाती थी। पुराने घरों का चबूतरा केवल वास्तुकला का हिस्सा नहीं था, बल्कि सामाजिक मेलजोल, पारिवारिक संस्कार, सुरक्षा और सामुदायिक जीवन का प्रतीक था।
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