कोहराम लाइव डेस्क : करवा चौथ का व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और उनकी सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती है। करवा चौथ पर सुहागिन महिलाएं करवा माता के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा-अर्चना करती है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन बिना पानी पीए उपवास रखती है। रात को चांद के दर्शन और पूजा के बाद पति के हाथों से जल ग्रहण करती है। करवा चौथ में चांद का दर्शन और पूजा का विशेष महत्व होता है। सुबह से निर्जला व्रत रखते हुए जब रात को चांद के दर्शन होते तब करवा चौथ का व्रत पूरा माना जाता है।
करवा चौथ की कहानी
देवों और दानवों के बीच युद्ध में देवताओं की हार हो रही थी। सभी देवताओंं ने तब ब्रह्मदेव से प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को सुहाग के लिए व्रत करने को कहा। ऐसा करने से उनके पतियों की युद्ध में विजय हुई, तब से कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा चौथ मनाया जाता है।
पूजा करने की विधि
- इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सरगी ग्रहण करनी चाहिए। इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत करना होता है। फिर सूर्योदय से पहले स्नानादि से निवृत्त हो जाएं।
- इस दिन करवा माता की पूजा की जाती है। साथ ही शिव-पार्वती की भी पूजा की जाती है।
- अपराह्न 4 बजे से 5 बजे के बीच किसी बड़े यानी सास-जेठानी अथवा किसी अन्य महिलाओं के साथ करवा चौथ माता की कहानी सुनें।
- कहानी सुनते समय एक पटरे या चौकी पर जल से भरा हुआ लोटा रखें।
- एक थाली लें। फिर एक मिट्टी के करवे में रोली, गेहूं, चावल रखकर उसे ढक्कन समेत थाली में रख दें।
- इसके बाद तेरह करवे रोली से सतीया लगाकर बायने के लिए रख लें।
- जब आप कहानी पूरी सुन लें तब सबसे पहले एक करवे पर हाथ फेरें। फिर वह करवा अपनी सास को दे दें। फिर उनके पैर छूएं।
- इसके बाद रोली सतीया लगे हुए खांड के तेरह करवे वहां मौजूद सुहागिन महिलाओं को बायने में दे दें।
- फिर 13 गेहूं के दानें और लोटे का जल अलग रख दें। इसे चंद्रमा को अर्घ्य देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
- रात में चांद निकलने के बाद अर्घ्य दें और इसके पश्चात अपने पति के हाथ से जल ग्रहण करें। फिर भोजन कर व्रत खोल लें।
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