UP : आकाश में सूर्य धीमे-धीमे चढ़ रहा था। वहीं, धरती पर उत्सव की लहरें थिरक रही थीं। अयोध्या की धूल भी आज गुलाब की खुशबू सी लग रही थी, दिन के ठीक 12 बजे सूर्यदेव ने अपनी आभा का सर्वस्व समर्पित किया। पीतल की नालियों, दर्पणों और लेंसों से होती हुई ये किरनें, विज्ञान और आस्था की सरिता बनकर गर्भगृह में उतरीं… और फिर…रामलला के ललाट पर ‘सूर्य तिलक’ किया। अयोध्या नगरी में उमड़ी भीड़ में कोई मां की तरह रो रहा था, कोई पिता की तरह भावुक था। भक्तों की आंखें नम थीं, और मन में एक ही शब्द — “धन्य हैं हम, जिन्होंने इसे देखा…” सूर्य की किरणें चार मिनट तक उनके ललाट पर टिक गईं — जैसे स्वयं सूर्य भी राम के बाल रूप को छोड़ना नहीं चाहते हों। पूरे रामनगरी ‘जय श्रीराम’ के जयकारों से गूंज उठी।
जब सूर्य ने रामलला के ललाट को चूमा
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