Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा की तपती दोपहर थी, पर न्यायालय परिसर में एक शीतल पुण्य हवा बह रही थी। यह हवा थी सेवा की, समर्पण की और इंसानियत की, क्योंकि उसी न्याय मंदिर के आंगन में जल उठी थी एक दीया, रक्तदान-सह-स्वास्थ्य जांच शिविर का। दीप प्रज्वलन की ज्योति में जब प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश नलिन कुमार का हाथ लगा तब एक-एक कर न्यायिक पदाधिकारियों की पंक्ति रक्त बहने को तैयार बांहें आगे बढ़ीं, ये रक्त आत्मा की गहराई से बह रहा था, यह रक्त किसी अनजान की सांसों को लौटाने निकला था। न्यायाधीश दिनेश कुमार हों, अवर न्यायिक दण्डाधिकारी कुमार विपुल हों, या वो गुमनाम से न्यायालय कर्मी – संजय, अभिषेक, बिरन या अमर… ये नाम उस पल नायक बन गये थे। इनकी रगों से बहते रक्त में एक नवजीवन की लौ थी।
सचिव निभा रंजना लकड़ा ने जब थैलीसीमिया और सिकल सेल के मरीजों की पीड़ा को शब्द दिये, तो एक लम्हे को सबकी आंखों में नमी तैर गई। उन्होंने समझाया कि एक यूनिट रक्त किसी के लिये “एक और जन्म” हो सकता है। इस पावन बेला की खास बात यह रही कि कैदियों के जीवन में भी मानवीय उजास की एक किरण डाली गई। निभा रंजना लकड़ा ने गढ़वा कारा का निरीक्षण कर कैदियों के हालात, स्वास्थ्य और अधिकारों की जानकारी दी। वह लम्हा शायद सबसे भावुक था, जब एक कैदी की आंखों से अनजाने में आंसू बह निकले, शायद पहली बार उसने महसूस किया होगा कि न्याय का चेहरा कठोर नहीं, करुणामय भी हो सकता है। गढ़वा के इतिहास में यह दिन एक मिसाल बन कर दर्ज हो गया, जब न्याय की कुर्सियां इंसानियत की चौखट बन गईं, और जहां दीवारों के बीच उग आया एक उम्मीद का गुलाब।








