कोहराम लाइव डेस्क : 12 जनवरी को विश्व आध्यात्मिक पुरुष Swami Vivekanand की जयंती है। पूरी दुनिया में स्वामी जी की जयंती और पुण्यतिथि पर उनके द्वारा शिकागो में आयोजित धर्म सम्मेलन के भाषण का जिक्र किया जाता है। ऐसा इसलिए कि धर्मों को लेकर उनका ज्ञान अपरिमित था। वे भारत में धर्म की जरूरत से लेकर हिंदू धर्म के बारे में भी एक खास राय रखते थे। आइए, उनकी जयंती पर आपको रूबरू कराते हैं कि हिंदू धर्म के बारे में क्या थी उनकी सोच।
प्रगतिशील सोच
दिल्ली यूनिवर्सिटी के दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के मानक निदेशक और समाजशास्त्री प्रो. जेपी दुबे के मुताबिक, स्वामी विवेकानंद धर्म के बारे में प्रगतिशील सोच रखते थे। उन्होंने दुनिया को बताया कि हिंदू धर्म हमेशा परिष्कृत करने और इंप्रूव करने के लिए व्यक्ति को तैयार करता है।
अवध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. मनोज दीक्षित ने कहा कि स्वामी जी किसी भी धर्म की उपेक्षा नहीं करते थे। उन्होंने दुनिया के सामने जो वेदांत दर्शन रखा वो वाकई धर्म की सही विवेचना करता है।
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स्वीकार करें धार्मिक विचारों की विविधता
स्वामी विवेकानंद कहते थे कि वेदांत ही सिखाता है कि कैसे धार्मिक विचारों की विविधता को स्वीकार करना चाहिए। सभी को एक ही विचारधारा के अंतर्गत लाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। वेदांत विश्व के एकत्व की बात करता है।
मानवता को एक सूत्र में पिरोना हिंदू धर्म का संदेश
स्वामी विवेकानंद ने कहा कि हिंदू धर्म का असली संदेश लोगों को अलग-अलग धर्म संप्रदायों के खांचों में बांटना नहीं, बल्कि पूरी मानवता को एक सूत्र में पिरोना। गीता में भगवान कृष्ण ने भी यही संदेश दिया था कि अलग-अलग माध्यमों से होकर हम तक पहुंचने वाला प्रकाश एक ही है।
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असाधारण पवित्रता और असामान्य शक्ति
ईश्वर ने भगवान कृष्ण के रूप में अवतार लेकर हिंदुओं को बताया कि मोतियों की माला को पिरोने वाले धागे की तरह मैं हर धर्म में समाया हुआ हूं। तुम्हें जब भी कहीं ऐसी असाधारण पवित्रता और असामान्य शक्ति दिखाई दे, जो मानवता को ऊंचा उठाने और उसे सही रास्ते पर ले जाने का काम कर रही हो, तो समझ लेना मैं वहां मौजूद हूं।








