Ormanjhi(Kuldeep/Amitabh) : राजधानी रांची से सटे ओरमांझी प्रखंड के गगारी पंचायत में एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है। अमर शहीद जीतराम बेदिया के गांव गगारी टुंगरी टोला में इस बार सरहुल पूजा की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिये समाज के लोगों ने शराब के बजाय महुआ, सखुआ फूल, मुनगा, सुटी, कटहल, मडुआ, धूप-दीप और सिंदूर से सरना मां की पूजा करने का संकल्प लिया है। गांव के मुखिया एवं झारखंड प्रदेश मुखिया संघ के कार्यकारी अध्यक्ष धनराज बेदिया की अगुवाई में वंशजों और समाज के बुजुर्गों की एक अहम बैठक हुई। इसमें बताया गया कि अंग्रेजों के आने से पहले आदिवासी समाज में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा की जाती थी, जिसमें शराब का उपयोग नहीं किया जाता था। पूजा के दौरान महुआ, मुनगा, सुटी, सखुआ के फूल, फुटकल साग, मडुआ, कठर (कटहल), सिंदूर और धूप-दीप का उपयोग होता था। हालांकि, अंग्रेजों ने जल-जंगल-जमीन को लूटने और समाज को कमजोर करने के लिये आदिवासियों को शराब का आदी बना दिया। धीरे-धीरे यह परंपरा पूजा का हिस्सा बन गई। लेकिन अब, गगारी गांव फिर से अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने के लिये एक नये उलगुलान (क्रांति) की शुरुआत कर रहा है। बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि इस बार सरहुल पूजा पूरी पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ होगी, लेकिन शराब का उपयोग नहीं किया जायेगा। इसके बजाय, महुआ और सखुआ के फूल, मडुआ, सुटी, कटहल, धूप-दीप और सिंदूर से पूजा होगी। इस निर्णय का पूरे गांव में स्वागत किया गया। पूजा की तैयारियों के तहत ढोल-नगाड़ों की थाप पर सरहुल गीतों के साथ नृत्य किया गया, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय हो गया। सुनें क्या बोले मुखिया धनराज बेदिया एवं अन्य…












