UP : महाकुंभ में आये नागा संन्यासी को लेकर दुनिया के हर कोने-कोने में इनका ही नाम है। क्या होते हैं और कैसे बनते हैं नागा सन्यासी इसको लेकर मीडिया में आई खबर के अनुसार नागा सन्यासी केवल कुंभ में बनते हैं। वहीं, उनकी दीक्षा होती है। सबसे पहले साधक को ब्रह्मचारी के रूप में रहना पड़ता है। उसे तीन साल गुरुओं की सेवा करने और धर्म-कर्म एवं अखाड़ों के नियमों को समझना होता है। इसी अवधि में ब्रह्मचर्य की परीक्षा ली जाती है। अगर अखाड़ा और उस शख्स का गुरु यह तय कर ले कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है तो फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है। यह प्रक्रिया महाकुंभ में होती है। जहां उसे ब्रह्मचारी से महापुरुष और फिर अवधूत बनाया जाता है। महाकुंभ में गंगा किनारे उनका मुंडन कराने के साथ उसे 108 बार नदी में डूबकी लगवाई जाती है। अंतिम प्रक्रिया में उनका खुद का पिंडदान तथा दंडी संस्कार आदि शामिल होता है। अखाड़े की धर्म ध्वजा के नीचे अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर उसे नागा दीक्षा देते हैं। प्रयागराज के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को राज राजेश्वरी नागा, हरिद्वार में दीक्षा लेने वालों को बर्फानी, उज्जैन में दीक्षा लेने वालों को खूनी नागा और नासिक वालों को खिचड़िया नागा के नाम से जाना जाता है। इन्हें अलग-अलग नाम से केवल इसलिये जाना जाता है, जिससे उनकी यह पहचान हो सके कि किसने कहां दीक्षा ली है।
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