Kohramlive : रेत के समंदर से चली थी एक बारात, सपनों में सजी थी एक दुल्हन, लेकिन सीमा पर तने बंदूक के साये ने प्रेम की इस कथा को अधूरा छोड़ दिया। बाड़मेर के शैतानसिंह चार साल से इस पल का इंतजार कर रहे थे। दिल में अरमान था, हाथ में वीजा था, माथे पर पिता का आशीर्वाद था। बारात के साथ वह अटारी-वाघा सीमा तक पहुंचे भी, हर कदम पर बंधते सपनों की डोर के साथ। लेकिन तभी खबर आई, सीमा बंद है। पाकिस्तान की धरती पर दुल्हन के हाथों में मेहंदी सूखने लगी और भारत की सीमा पर दूल्हा अपने अरमानों का जनाजा उठाये वापस लौट आया। 22 अप्रैल को पहलगाम की खूनी दोपहर ने न सिर्फ देश को दहला दिया, बल्कि प्रेम की इस अनदेखी कहानी को भी वीरान कर दिया। सरकार ने सख्त आदेश दिये, वीजा रद्द, सीमा बंद। और शैतानसिंह को मजबूर होकर अपने गांव लौटना पड़ा, बिना दुल्हन, बिना बाजा, बिना बारात के शोर के… सिर्फ एक चुप्पी लिये। शैतानसिंह ने लौटते हुये कहा कि “ये मेरी हार नहीं है, ये देश की इज्जत का सवाल है। सरकार का फैसला सही है। आतंकवाद से लड़ना जरूरी है। मेरा सपना भले अधूरा रह गया, लेकिन मेरा देश पहले है।”
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