Garhwa(Nityanand Dubey) : झारखंड के गढ़वा जिले का एक शांत-सा गांव दुलदुलवा, जहां कभी हर सुबह महुआ की महक और हर शाम भट्ठियों के धुयें में डूबी होती थी। जहां जिंदगियां कच्ची शराब के दौर में उलझ चुकी थीं। बुज़ुर्गों की आंखों में उम्मीद नहीं थी और बच्चों के सपने धुयें में खो जाते थे। लेकिन, कहते हैं न कभी-कभी किसी अजनबी के आने से वक्त की धारा बदल जाती है। गढ़वा के SDO संजय कुमार को जब इस गांव की “शराब भट्ठियों से बंधी बेड़ियों” की खबर मिली, तो उन्होंने हथकड़ी से नहीं, संवाद और संवेदना से बदलाव की कहानी लिखनी शुरू की। वो गांव पहुंचे, लोग भागे। लेकिन यह अफसर लाठी लेकर नहीं दौड़ा, बल्कि कॉफी पर बुलावा भेजा, एक आमंत्रण, एक विश्वास।
जब गांव की 30 औरतें झिझकती SDO कार्यालय पहुंचीं, उन्हें लगा उन्हें डांट मिलेगी। लेकिन यहां तो कॉफी मिली और पूरा मान-सम्मान। उन औरतों की आंखों में वर्षों से दबा हुआ दर्द छलक पड़ा, “साहब! हम नहीं चाहते कि हमारी बेटियां इसी दलदल में पलें-बढ़े।” संजय कुमार ने उन्हें सुना और सबकुछ समझा। इसके बाद उन्हीं औरतों ने गांव के आदमियों तक संदेश पहुंचाया, “डरना नहीं है, अब कोई पुलिसिया डंडा नहीं उठेगा, सिर्फ बात होगी।” इसके बाद गांव के पुरुष आये। पूरे उम्मीद के साथ। SDO बोले, “अगर तुम बदलोगे तो मैं तुम्हारे लिये रोज यहां आऊंगा। अगर तुम तौबा करोगे, तो मैं तुम्हारे लिये विकल्प लाऊंगा।” उनमें से कई ने हाथ उठाये, “हम शराब नहीं बनायेंगे।”
SDO संजय कुमार ने 10 दिन तक रोज गांव में डेरा डाला। बैठकें कीं, मोहल्लों में गये, जंगलों में ड्रोन से छिपी भट्ठियों का पर्दाफाश करवाया, अर्ध-निर्मित शराब नष्ट करवाई। वहीं, चार अनाथ बच्चियों को सहायता दिलाई, युवाओं को रोजगार दिलाने की पहल की, बच्चों को प्रेरित किया कि “मां-बाप से कहो, अब शराब नहीं।” अब दुलदुलवा में भट्ठियों की राख है, लेकिन आशा की लौ जल रही है। हर गली में संजय कुमार का नाम सम्मान से लिया जाता है। गांव वाले कहते हैं, “पहले पुलिस से डरते थे, अब भरोसा है संजय बाबू पर। पहले महुआ था, अब मंजिल है।”












