UP : इस बार अलीगढ़ नहीं, यूपी की शाहजहांपुर की मिट्टी गवाह बनी उस इश्क की, जिसमें उम्र, रिवाज और रिश्तों के तमाम दायरे बौने पड़ गये। वो एक मां थी, चार बच्चों की विधवा… उम्र 45 की। लेकिन जब बेटी के लिए दूल्हा देखने निकली, तो खुद दुल्हन बन बैठी। जिस गांव की पगडंडियां जानती थीं उसका दर्द, वहां की हवाओं ने पहली बार उसकी सिसकियों की जगह उसकी मुस्कुराहट सुनी।
कहानी कुछ यूं शुरू हुई…
बंडा तहसील का एक आम दिन था। चार बच्चों की मां अपनी बीस साल की बेटी के लिये रिश्ते देखने निकली थी। लड़का समझदार था और उम्र में उससे करीब आधा। रिश्ता बेटी के लिये था, पर बात बनते-बनते दिल की गहराइयों तक जा पहुंची। फोन की बातें लंबी हुईं, फिर मीठी होने लगीं और फिर एक दिन, दिल से ‘मां’ की आवाज हट गई और बस ‘मैं’ रह गई।
बेटी ने नहीं रोका, साथ दिया
जब बेटी को पता चला कि जिसकी शादी के लिये वो रिश्ते देख रही थी, अब वही मां का ‘अपना’ बन चुका है, तो इस बेटी ने रिवायतों से अलग जाकर एक नई इबारत लिखी। उसने कहा, “मां, तूने हमारे लिये बहुत कुछ सहा। अब अगर दिल धड़का है, तो मत रोक इसे। मेरी शादी बाद में हो जायेगी, तू अपनी मोहब्बत की डोली सजा ले।” चार दिन पहले, शाहजहांपुर के एक मंदिर में वरमाला डाली गई, फेरे लिये गये कथित होने वाला ‘दामाद’ अब पति बन चुका था। लेकिन मोहब्बत का ये अंत सुखद नहीं था। महिला अकेली लौट आई अपने गांव, पति साथ नहीं आया। और गांव वालों ने जब सवाल पूछे, तो जवाब नहीं, सिर्फ चुप्पी मिली। अब गांव की गलियों में गूंज रही है फुसफुसाहट, “कौन सी मां है ये…?” “अरे, बेटी के दूल्हे को ही पहनाई वरमाला?” “मोहब्बत थी या कोई सौदा?”












