अखिलेश कुमार
नामकुम : ट्रैफिकिंग की शिकार बेटी को ढूंढने के लिए एक लाचार बाप 2 महीने दिल्ली में रहा। रिक्शा चलाया। बेटी को ढूंढते-ढूंढते एक बाप थक गया, मगर बेटी नहीं मिली। थक हार कर बाप अपने गांव वापस लौट आया। लौटते ही यहां उनकी तबीयत खराब हो गई। बेटी के सदमे में बाप की जान चली गई। लाचार और बेबश मां क्या करती। सुनीता की तरह उसके बाकी भाई-बहन के साथ भी न हो, इसलिए उसने बाकी बच्चों को डर से आशा संस्था में छोड़ आई। वहां दिल्ली में सुनीता प्रताडि़त होती रही। एक दिन किसी न्यूज चैनल में अपने मां-बाप की खबर देखी तब उसे अपने घर की याद सताने लगी।

अगस्त 2018 में मौका पाकर सुनीता वहां से भाग निकली। मगर घर वापस आने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे। वह गुड़गांव में घर-घर जाकर दाई का काम की। 21 जून को आनंद विहार स्टेशन से ट्रेन पकड़ी। 22 जून को हटिया पहुंची। मगर इस दौरान उसे अपना घर भी याद नहीं था। किसी तरह पूछते-पूछते वह घर पहुंची। 11 साल की उम्र में ट्रैफिकिंग की शिकार हुई सुनीता 14 साल बाद जब वापस अपने घर लौटी तो कोई उसे पहचान न सका। उसने जब अपनी आपबीती सुनाई तो सभी की आंखें भर आई। मां बेटी को गले लगा कर चूमने और रोने लगी। पिता को घर में नहीं देख बेटी ने मां से पूछा बाबा कहां है। यह सुनते ही मां फूट-फूट कर रोने लगी। मां ने रोते हुए बताया कि तुम्हें ढूंढते ढूंढते तेरे बापू इस दुनिया को छोड़ कर चले गए।
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