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NSG और NIA कमांडो से घिरे तहव्वुर राणा, जब सवालों की गो’लियां चली…

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Kohramlive(Neeraj thakur) : रात की रूहानी खामोशी में जब दिल्ली की जमीन पर एक विशेष विमान उतरा, तो उसके भीतर अतीत का एक धधकता चेहरा था, तहव्वुर हुसैन राणा। 26/11 की लपटों में झुलसी मुंबई की रातें आज फिर सिसक पड़ीं। वो साया, जो अमेरिका की जेलों में छिपा बैठा था, अब कानून के सामने है। उसके हाथों में हथकड़ियां थीं, लेकिन चेहरे पर वो पुराना गुरूर अब नहीं था। कई ऑपरेशन की परछाइयों में काम करने वाले अब खुद उसकी कड़े पहरे में थे। एयरपोर्ट पर कदम रखते ही उसके चारों ओर सुरक्षा की एक दीवार थी, पर ये दीवार अब उसकी हिफाजत के लिये नहीं, बल्कि देश के जख्मों से बचाने के लिये थी।

कानून की पहली दस्तक – अदालत की पहली पेशी

गुरुवार की रात… पटियाला हाउस कोर्ट के गलियारे में सन्नाटा था, लेकिन भीतर एक भूचाल आया। “क्या तुम्हारे पास कोई वकील है?” जज के सवाल पर राणा चुप रहा। यही चुप्पी, उसकी कहानी की पहली गवाही थी। कभी पाकिस्तानी दस्तावेजों की शान था राणा, अब वो देश भी कह रहा है, “हमारा इससे कोई वास्ता नहीं।” जिसने कसाब को मुंबई भेजा, जिसने अबू जुंदाल को आवाज दी, वही शख्स अब भारत के सामने है।

दोस्ती, जासूसी और धोखा

शहर था शिकागो, मौसम सर्दियों का… और दो चेहरे एक कॉफी शॉप की टेबल पर थे — एक पूर्व फौजी तहव्वुर राणा और दूसरा एक रहस्यमयी शख्स.. डेविड कोलमैन हेडली। राणा, पाकिस्तान की सेना में डॉक्टर रहा, लेकिन अमेरिका में उसने ‘इमिग्रेशन सर्विस’ की आड़ में एक नया धंधा शुरू किया, जासूसी का। उसका दोस्त हेडली, आधा अमेरिकी, आधा पाकिस्तानी, लेकिन पूरा दोहरा खिलाड़ी। दिखता था बिजनेसमैन, लेकिन असल में था लश्कर-ए-तैयबा की आंख और कान। हेडली भारत में दाखिल हुआ बतौर डेनमार्क दूतावास के खिलाफ काम करने वाला एजेंट। लेकिन उसकी असली नजरें थीं — ताज होटल, CST स्टेशन और नरीमन हाउस पर। राणा, उसके लिये वीसा, होटल बुकिंग्स और कागजी नकाब बनाता रहा।

दोस्ती के पर्दे में साजिश का जाल

हेडली ने NIA को बताया, मैंने जो भी किया, राणा को पता था। वो मेरी हर हरकत में शामिल था।” लेकिन राणा ने हमेशा कहा, “मुझे लगा हेडली डेनमार्क मिशन पर काम कर रहा है।” सच क्या था? शायद दोनों झूठ बोल रहे थे…या फिर सच खुद दो हिस्सों में बंट चुका था।

अमेरिका में गिरफ्तारी,  शिकागो केस का ट्रायल

2011 में अमेरिका की अदालत में केस चला, हेडली ने कबूल किया कि वो 26/11 का हिस्सा था। राणा को साजिश का हिस्सा नहीं माना गया, लेकिन डेनमार्क आतंकी हमले की योजना में दोषी पाया गया। 14 साल की सजा मिली।

लेकिन भारत चुप नहीं बैठा…

NIA ने सबूत जुटाए, कोर्ट से आदेश लिया, और आखिरकार, अमेरिका को झुका दिया। अब राणा भारत में… और कहानी बस शुरू हुई है।

जब दिल्ली की रातें फिर डरने लगीं

9 अप्रैल की रात… दिल्ली की हवाओं में अजीब सी खामोशी थी। इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक विशेष विमान धीरे से उतरा, उसमें था तहव्वुर राणा, अमेरिका से प्रत्यर्पित किया गया वो साया, जिसने कभी मुंबई में मौत का नाच लिखा था। लॉस एंजेलिस से उड़ान, फिर अज्ञात स्टॉपओवर, और आखिरकार भारत की धरती। NSG कमांडो, NIA अधिकारी और विदेश मंत्रालय की निगरानी में राणा की वापसी हुई, बिल्कुल किसी हाई-प्रोफाइल आतंकी की तरह नहीं, बल्कि जैसे अपने अतीत का गवाह खुद लौट आया हो। रात के सन्नाटे को चीरते हुये एक जेल वैन, बख्तरबंद स्वाट वाहन, एम्बुलेंस और दर्जनों छिपे कैमरे, सबने राणा को घेर रखा था।

पटियाला हाउस कोर्ट में पहली पेशी

जज ने पूछा — “क्या तुम्हारे पास वकील है?”
राणा का जवाब: “नहीं।”
चुप्पी में जो डर था, वो अब कानूनी प्रक्रिया में तब्दील हो चुका था।
दिल्ली विधिक सेवा प्राधिकरण से पीयूष सचदेवा को वकील नियुक्त किया गया।

हथकड़ी में जकड़ा इतिहास

अदालत के बाहर बेशक कैमरे खामोश थे, लेकिन अतीत चीख रहा था —”ये वही है जिसने कसाब को रास्ता दिखाया, ये वही है जो परदे के पीछे बैठा रहा… अब वक्त है जवाब देने का।” तभी बाहर से एक और आवाज आई, पाकिस्तान का।“ हमारा इससे कोई लेना-देना नहीं। राणा कनाडाई नागरिक है।” एक और मोहरा साफ हाथ झाड़ गया। लेकिन भारत की माटी जानती है, उस रात की चीखें अब तक गूंज रही हैं।

जब सवालों की गोली चलाई गई…

दिल्ली की एनआईए लॉकअप में उस रात नींद नहीं थी — न अफसरों को, न तहव्वुर राणा को। बाहर से वो ठंडा, शांत और खामोश दिखता था… पर अंदर कुछ था जो उसे सोने नहीं दे रहा था। और NIA? वो हर लफ्ज के पीछे तलाश रही थी — साजिश की आग।

पहला सवालः ”कसाब तुम्हारा मोहरा था” राणा की आंखों में हलचल, पर होठों पर ताला।
दूसरा सवालः “हेडली के साथ कौन था? पाकिस्तानी सेना का कोई नाम?”
फिर वही चुप्पी… पर चेहरा बता गया, कुछ तो है, जो अब तक दबा रखा है।

NIA के पास हैं 15 साल पुराने राज के ताले… 

▪️ होटल ताज की रेकी कैसे हुई?
▪️ हेडली के इंडिया दौरे में किन-किन से मुलाकात करवाई गई?
▪️ पाकिस्तान की ISI की भूमिका क्या थी?

 “लश्कर का लॉकर – जब नाम ज़ुबान पर आने लगे”

दिल्ली की तन्हा दीवारों के बीच तहव्वुर राणा अब सिर्फ एक आरोपी नहीं, एक चाभी बन चुका है, उस ताले की, जो 26/11 के पीछे छिपे असली चेहरों को खोल सकता है। और NIA की टीम उस लॉकर तक पहुंच चुकी है… बस चाहिये राणा की गवाही।

पहली दराज: ISI का ‘भाईजान’

पूछताछ में जब अफसरों ने ISI के कोडवर्ड ‘भाईजान’ का जिक्र किया, राणा का चेहरा हल्का सा फड़का।
“कौन था वो जो हेडली को मिशन पर भेज रहा था?”
राणा की आंखें झुकी रहीं, लेकिन पसीना जवाब देने लगा।

दूसरी दराज: लश्कर-ए-तैयबा की बैठकों की डायरी

राणा के पास की डायरी में हेडली के मुंबई दौरे से पहले दो मीटिंग्स का जिक्र है, लाहौर और कराची में।
नाम साफ नहीं, पर कोड हैं —
🔸 D-Company
🔸 M-23
🔸 S-Commander
NIA जानती है, इन कोड्स के पीछे हैं वो लोग, जिनके चेहरे अब तक अंधेरे में थे।

तीसरी दराज: अमेरिका में बने नक्शे, भारत में बहाया गया खून

राणा ने कबूल किया कि शिकागो से हेडली के लिये बिजनेस कवर उसी ने बनाया। वीजा, होटल बुकिंग, नक्शों की छपाई, सब उसी के ऑफिस से हुआ। यानी… उसने दरवाज़ा खोला, हेडली ने हमला किया।

जब नाम लेने लगा तहव्वुर राणा…

एनआईए के कमरे में उस रात टेबल पर चाय नहीं, सिर्फ फाइलें थीं। और सामने बैठा था तहव्वुर राणा — कुछ थका हुआ, कुछ टूटा हुआ… और अब, शायद बोलने को तैयार। 26/11 की परतें खुलने लगी थीं, और अब आखिरी चेहरा सामने आने वाला था…

राणा बोला — “उसने कहा था, यह जंग है…”

कौन?
राणा ने कहा — “उसका नाम मत लिखो, बस इतना समझो… वो पाकिस्तान के ‘दूसरे माले’ से चलता है, और दुनिया उसे दानव नहीं, दार्शनिक समझती है।”

NIA समझ गई — हाफिज़ सईद
वो नाम जो दशकों से परदे के पीछे था, अब राणा की ज़ुबान पर था।

एक और नाम – ‘जनरल S’

राणा ने इशारा किया एक फौजी अफसर की ओर। ISI का एक रिटायर्ड अधिकारी, जिसने कहा था, इंडिया को उसकी आर्थिक राजधानी से हिला दो… ये बस शुरुआत है।” अब पहली बार, भारत के पास गवाही थी, दस्तावेज थे और वो जुबान थी जो अदालत में गूंजेगी।

NIA के पास अब है पूरा चार्जशीट का खाका

  • हेडली – मैदान का मोहरा
  • राणा – लॉजिस्टिक्स और नकाब
  • ISI – निर्देश और समर्थन
  • लश्कर – हमलावर
  • हाफिज सईद – मास्टरमाइंड

जब राणा से पूछा गया, ‘क्या तुम दोषी हो?'”

पटियाला हाउस कोर्ट का कमरा जैसे उस दिन इतिहास की गवाही लेने बैठा था। सामने थे वकील, पीछे पत्रकार, और बीच में — हथकड़ियों में जकड़ा, वो चेहरा जिसे एक दौर में डॉक्टर कहा गया, आज जिसे आतंकी कहा जा रहा है — तहव्वुर हुसैन राणा। जज के सवाल पर राणा ने सिर उठाया…आंखें भीगी नहीं थीं, पर थकी हुई थीं। होंठ हिले, लेकिन जवाब नहीं आया। सन्नाटा… पूरे कोर्टरूम में जैसे वक्त थम गया हो।

सरकारी वकील नरेंद्र मान की दलीलें थीं धारदार

“यह आदमी न केवल 166 मौतों का गवाह है, बल्कि उनका सूत्रधार भी है। कसाब ने जो किया, वो हेडली ने देखा। और हेडली की आंखें थीं — यही तहव्वुर राणा।” बचाव पक्ष में के वकील पीयूष सचदेवा ने कहा, “क्या सिर्फ पहचान कराने से कोई दोषी हो जाता है? क्या बिना हथियार उठाये कोई आतंकी कहलाता है?” पर अदालत जानती है, 26/11 सिर्फ हमला नहीं था, वो जख्म था जो सबने देखा, और आज भी भारत की आत्मा पर दर्ज है।

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