Ranchi : झारखंड की धरती इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी से गुजर रही है। हरे-भरे जंगलों के पीछे, वीरानों की छांव में, कुछ ऐसा जहर पनप रहा है जो हमारे नौजवानों के लहू में घुलने लगा है। स्कूलों में, गली-मोहल्लों में, कॉलेज के केंपस में अफीम, गांजा, व्हाइटनर और कोकीन ने दोस्ती की शक्ल ले ली है। लेकिन, जब अंधेरा बहुत गहरा हो जाये, तो कहीं न कहीं एक मशाल भी जल उठती है, रांची के डोरंडा स्थित शौर्य सभागार में ऐसी ही एक मशाल जली, एक साजिश को मिटाने की कसम के साथ। सुबह की नमी में डोरंडा का शौर्य सभागार कुछ अलग ही तेज से दमक रहा था। पर्दे पर झारखंड का नक्शा चमक रहा था और उसके केंद्र में “नशामुक्त झारखंड” लिखा था। मंच पर खड़े थे IAS राहुल पुरवार, ऊंचे कद, संयमित चेहरे पर दृढ़ता और आंखों में वही चिंता जो एक पिता को अपने बिगड़ते बेटे को देखकर होती है। CM हेमंत सोरेन की सोच सिर्फ नारा नहीं, एक प्रण है,” उन्होंने कहा “हम अपने बच्चों को इस नशे की दलदल से बाहर निकालेंगे, किसी भी कीमत पर।” सभागार में बैठे उत्तरी छोटानागपुर के मास्टर ट्रेनर, जिनमें शिक्षक, पुलिस अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता थे। सबके दिलों में एक ही सवाल था, “हम कहां चूक गये?”
जहर की शक्ल
कुमार मनोहर मंजुल ने कहा कि “ड्रग्स अब अफीम की शक्ल में नहीं आते, अब ये बोतल में बंद कफ सिरप बनकर आते हैं, या फिर नेल पॉलिश की खुशबू में छुपकर,” उन्होंने खूंटी की बात की कि कैसे वहां अफीम की खेती एक शगुन बन गई थी, लेकिन अब प्रशासन ने मुफ्त बीज देकर उम्मीद की फसल बोने की शुरुआत की है। सभागार में बैठी रीमा की आंखें नम थीं, वो एक कॉलेज लेक्चरर और दो साल पहले उसने अपने ही छात्र को हॉस्टल के कमरे में बेसुध पाया था, नेलपेंट सूंघते हुये। डॉ सजल आशीष नाग की बातों में एक ममता थी, वो बताने आये थे कि कैसे नशा धीरे-धीरे बच्चों को लील जाता है। “पहले बच्चे किताबें छोड़ते हैं, फिर दोस्त। फिर जिंदगी। लेकिन, रिनपास में हम उन्हें लौटाते हैं, किताबें भी, दोस्त भी, जिंदगी भी।” सभा में सन्नाटा था। और फिर एक लड़की उठी, नम्रता, जो कभी खुद व्हाइटनर की आदी रही थी। उसने कहा, “मैं जिंदा हूं क्योंकि रिनपास ने मुझे दोबारा जन्म दिया।” यूनिसेफ के मृत्युंजय नायक ने कहा, “भारत ने दुनिया को बताया कि कलेक्टिव सपोर्ट क्या होता है, सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, हमें भरोसे का एक माहौल बनाना है। बच्चों को बताना है कि सिस्टम उनके साथ है, प्रशासन दुश्मन नहीं, संरक्षक है।” दूसरे सत्र में सुभादीप अधिकारी आये, उनके हाथों में थी एक ऐसी फाइल जिसमें सिर्फ काग़ज नहीं, कवच-कुंडल थे। उन्होंने योजना रखी कि कैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस, आजीविका, पर्यावरण और खेलकूद जैसे विभाग मिलकर एक अभियान बनायेंगे। एक ऐसा अभियान जो गांव-गांव में फैलेगा। हर स्कूली बच्चा, हर टीचर, हर पंचायत सेवक, नशा के खिलाफ योद्धा बनेंगे।
कसम
21 मई की दोपहर को शौर्य सभागार में मौन रखा गया। फिर एक एक कर सभी मास्टर ट्रेनरों ने मंच के सामने हाथ उठाया, “हम कसम खाते हैं, कि हम झारखंड के बच्चों को नशे से आजाद करेंगे कि हम गांव-गांव, गली-गली जाकर बतायेंगे कि जिंदगी एक नशा है, लेकिन ये अफीम नहीं, उम्मीद है।”












