एक खामोश ताकत थीं रूपी सोरेन…

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Ranchi(Neeraj Thakur) : झारखंड की राजनीति का इतिहास जब भी लिखा जायेगा, उसमें शिबू सोरेन का नाम बड़े अक्षरों में दर्ज होगा। लेकिन उस इतिहास के कुछ पन्ने ऐसे भी हैं, जो सुर्खियों में कभी नहीं आये। उन पन्नों में एक चेहरा था, रूपी सोरेन का। वह चेहरा, जिसने संघर्ष के दिनों में परिवार को संभाला। जिसने पति के लंबे राजनीतिक और सामाजिक सफर के बीच घर की जिम्मेदारियों को अपने कंधों पर उठाये रखा। जिसने अपने बच्चों को सिर्फ पाला नहीं, बल्कि उस परिवार की नींव को मजबूत किया, जिसका नाम आगे चलकर झारखंड की सियासत में एक पहचान बन गया। रूपी सोरेन का जीवन किसी मंच की चमक से नहीं, बल्कि घर की चौखट, परिवार की जिम्मेदारियों और संघर्ष के उन दिनों से बना था, जिनकी गूंज शायद कभी अखबारों की सुर्खियों तक नहीं पहुंची। जब भी दिशोम गुरु शिबू सोरेन का नाम लिया जायेगा, उनके संघर्ष की कहानी भी याद की जायेगी। जब भी हेमंत सोरेन की राजनीतिक यात्रा की चर्चा होगी, उनके पीछे खड़ी उस मां का चेहरा भी याद आयेगा, जिसने परिवार को अपनी ममता की छांव में संभाले रखा। एक ऐसी महिला, जिनका नाम शायद राजनीतिक मंचों पर बहुत कम सुनाई दिया, लेकिन जिनकी मौजूदगी सोरेन परिवार की जिंदगी में हमेशा गहरी रही। वह शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी थीं, हेमंत सोरेन की मां थीं और परिवार के लिये वह मजबूत आधार थीं, जिस पर संघर्ष के लंबे वर्षों में घर टिका रहा।

सियासत की चमक से दूर, संघर्ष की छांव में जीवन

शिबू सोरेन की राजनीति किसी आरामदेह रास्ते से होकर नहीं गुजरी। झारखंड आंदोलन के दिनों से लेकर राज्य की सत्ता के गलियारों तक का सफर संघर्षों से भरा रहा। जब शिबू सोरेन गांव-गांव घूमते रहे, लोगों के बीच अपनी आवाज बुलंद करते रहे, तब घर की दुनिया की जिम्मेदारियां रूपी सोरेन के हिस्से में थीं। राजनीति के इतिहास में अक्सर मंच पर खड़े व्यक्ति की कहानी लिखी जाती है। लेकिन उस कहानी के पीछे घर को संभालने वाले हाथों का जिक्र कम होता है। रूपी सोरेन की कहानी उसी खामोश हिस्से की कहानी थी। शिबू सोरेन बाहर संघर्ष कर रहे थे और रूपी सोरेन भीतर परिवार को संभाल रही थीं।

मां के आंचल में पला वह परिवार, जिसने झारखंड की राजनीति बदल दी

रूपी सोरेन की सबसे बड़ी पहचान शायद यही थी कि वह एक मां थीं। हेमंत सोरेन के लिये वह सिर्फ मां नहीं, बल्कि जीवन की वह छांव थीं, जहां लौटकर हर थकान कुछ देर के लिये ठहर जाती है। आज जब हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री हैं, तो सत्ता की ऊंची कुर्सी के पीछे उस मां का चेहरा भी दिखाई देता है, जिसने जीवन के लंबे सफर में अपने बच्चों को परिवार की जड़ों से जोड़े रखा। CM हेमंत सोरेन के लिये रूपी सोरेन हमेशा वही मां रहीं, जिनके सामने मुख्यमंत्री होने की पहचान छोटी पड़ जाती है। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा बेटा जब मां के सामने आता है, तो उसकी सारी राजनीतिक पहचान पीछे छूट जाती है। हेमंत सोरेन के लिये भी रूपी सोरेन सिर्फ मां थीं। वह मां, जिसके आंचल में बचपन बीता। वह मां, जिसने परिवार के सुख-दुख को करीब से देखा। वह मां, जिसने अपने बच्चों को उस दौर में संभाला, जब परिवार के मुखिया का अधिकांश समय सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष में बीतता था। आज हेमंत सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री हैं। उनके राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव आये, मुश्किलें आईं, सत्ता मिली और चुनौतियां भी सामने आईं। लेकिन इन तमाम पहचानों के बीच उनके जीवन में एक पहचान हमेशा सबसे बड़ी रही, रूपी सोरेन के बेटे की। झारखंड का आंदोलन सिर्फ नेताओं के भाषणों और सड़कों पर हुये संघर्षों की कहानी नहीं है। इसके पीछे हजारों परिवारों की अपनी-अपनी कहानियां हैं। कई घरों में पति बाहर आंदोलन की राह पर थे और परिवार की चिंता घर में बैठी महिलाओं के हिस्से थी। रूपी सोरेन भी इसी दौर की एक ऐसी महिला थीं। उनका संघर्ष शायद अखबारों की सुर्खियों में नहीं आया, लेकिन परिवार को संभालना भी किसी आंदोलन से कम नहीं था। शिबू सोरेन के जीवन में राजनीति से पहले परिवार था और संघर्ष के बीच भी परिवार ही उनकी ताकत रहा। रूपी सोरेन ने उनके साथ जीवन का लंबा सफर तय किया। पति की राजनीतिक यात्रा के उतार-चढ़ाव देखे। परिवार की जिम्मेदारियां संभालीं और बच्चों को बड़ा होते देखा। शिबू सोरेन की सार्वजनिक पहचान जितनी बड़ी होती गई, रूपी सोरेन की निजी भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती गई। वह मंच पर नहीं थीं, लेकिन मंच तक पहुंचने वाले सफर में साथ थीं।

जब बेटा मुख्यमंत्री बना, मां वही रही

समय बदला। सोरेन परिवार झारखंड की राजनीति के केंद्र में आया। हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने। सत्ता के गलियारों में परिवार का प्रभाव बढ़ा। लेकिन मां की नजर में बेटा शायद वही रहा, घर का अपना हेमंत। राजनीति की दुनिया में पद बदलते हैं, संबोधन बदलते हैं, रिश्तों की व्याख्या बदलती है। मगर मां की आंखों में बेटे की तस्वीर नहीं बदलती। यही रूपी सोरेन की सबसे खूबसूरत पहचान थी। रूपी सोरेन के निधन ने सोरेन परिवार के उस स्तंभ को छीन लिया है, जो वर्षों से परिवार के सुख-दुख का साक्षी रहा। आज घर में लोग होंगे, रिश्तेदार होंगे, समर्थक होंगे। राजनीतिक साथी आयेंगे। श्रद्धांजलियों का सिलसिला चलेगा। लेकिन इन सबके बीच एक जगह ऐसी होगी, जहां सन्नाटा सबसे ज्यादा बोलेगा। वह जगह, जहां मां बैठती थीं।वह आवाज, जो अब सुनाई नहीं देगी। वह चेहरा, जिसे देखकर हेमंत सोरेन शायद कुछ पल के लिये मुख्यमंत्री नहीं, सिर्फ एक बेटा महसूस करते रहे होंगे।

आज पीछे रह गई हैं उनकी यादें

रूपी सोरेन के निधन के साथ सोरेन परिवार ने वह मां खोई है, जो रिश्तों को जोड़कर रखने वाली डोर थीं। शिबू सोरेन की जीवनसंगिनी के रूप में, हेमंत सोरेन की मां के रूप में और पूरे परिवार की मातृशक्ति के रूप में उनका जीवन हमेशा याद किया जायेगा। झारखंड की सियासत में शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन का नाम आगे भी लिया जायेगा। उनके संघर्ष, उनकी राजनीति और उनके फैसलों की चर्चा होती रहेगी। लेकिन उस चर्चा के बीच एक नाम ऐसा भी रहेगा, जो शायद सुर्खियों में कम रहा, रूपी सोरेन। वह नाम, जो किसी राजनीतिक पद से नहीं, बल्कि ममता, त्याग, धैर्य और परिवार के प्रति समर्पण से बना। मां के जाने के बाद घर खाली लगता है, लेकिन उसकी दी हुई परवरिश, संस्कार और ममता पूरे परिवार के जीवन में लंबे समय तक सांस लेती रहती है। CM हेमंत सोरेन ने भी अपने पोस्ट में बड़े भावुक शब्दों में लिखा है कि “बाबा के जाने के बाद माँ ही मेरी सबसे बड़ी छाँव थीं। आज वह छाँव भी प्रकृति की गोद में समा गयीं। माँ….”

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