Garhwa(Nityanand Dubey) : गढ़वा इन दिनों एक वजह से चर्चा में है, भविष्य को बचाने की जंग। लोहरदगा ग्राम स्वराज्य संस्थान और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन के बैनर तले 12 से 14 सितंबर तक चला “वैश्विक अंतर-धार्मिक प्रतिज्ञा सप्ताहांत” रविवार को समाप्त हुआ। लेकिन इसका असर लंबे समय तक गूंजेगा, क्योंकि यहां धर्मगुरु एक सुर में बोले, “बाल विवाह अब नहीं, बच्चों को मिलेगा बचपन, शिक्षा और स्वतंत्रता।” गढ़वा जामा मस्जिद के इमाम अब्दुल सम्मत ने साफ कहा कि “इस्लाम में बाल विवाह का कोई स्थान नहीं। निकाह एक पवित्र अनुबंध है, जिसके लिये समझ और जिम्मेदारी चाहिये। बच्चे इस बोझ को नहीं उठा सकते।” उनके स्वर मानो मस्जिद की दीवारों से निकलकर पूरे समाज को जगा रहे हों।
“पहले शिक्षा, फिर गृहस्थ जीवन”
बंशीधर मंदिर के पुजारी बृज किशोर तिवारी और अंजनी पांडेय ने गीता और धर्मशास्त्रों का हवाला देते हुये कहा कि
“बचपन ब्रह्मचर्य आश्रम है, शिक्षा और विकास का समय है। गृहस्थ आश्रम तब शुरू होता है जब इंसान परिपक्व और जिम्मेदार बनता है। बेटियों को पढ़ाइये, उन्हें वयस्क होने तक विवाह के बंधन में न बांधिये। यही सच्चा धर्म है।” सेन्हा ठाकुरबाड़ी के पुजारी राम ज्ञानी पाठक और लगमा ब्रह्मस्थान के पुजारी दशरथ पांडेय ने भगवद्गीता का उदाहरण देते हुये कहा कि “बचपन का अर्थ सीखना है, न कि विवाह का बोझ उठाना।” उन्होंने समाज से बच्चों को शिक्षा और सम्मान के साथ वयस्कता तक पहुंचाने की अपील की।
“यह पाप है, यह अपराध है”
भंडरिया प्रखंड के रोमन कैथोलिक चर्च कंजिया के फादर वाल्टर हेमरोम बोले, “बाल विवाह न केवल कानून तोड़ता है, बल्कि यह ईश्वर की इच्छा और बच्चों के अधिकारों पर भी आघात है।” उनकी आवाज में समाज और इंसानियत दोनों की पीड़ा छलक उठी। कार्यक्रम के अंत में सभी धर्मगुरुओं ने एक स्वर में प्रतिज्ञा ली और समाज के सामने आह्वान किया कि
“हम सब मिलकर बाल विवाह को खत्म करेंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिये उज्जवल भविष्य रचेंगे।” सैकड़ों स्थानीय लोग भी इस पहल के गवाह बने। उनके तालियों की गड़गड़ाहट इस बात की साक्षी थी कि गढ़वा अब बदलाव की राह पर निकल पड़ा है।












