Ranchi : आज आसमान कुछ और ही नीला था। धरती की सांसों में हरियाली की खुशबू घुली थी। रांची के हर स्कूल में, हर आंगन में एक चुपचाप प्रेम उग रहा था, “एक पेड़ मां के नाम”। यह कोई सरकारी योजना नहीं थी, यह एक मां की ममता को जमीन पर रोपने का जज्बा था, एक बेटे, एक बेटी का मौन प्रण “मां, तुझसे मिली इस सांस को अब धरती को लौटा रहे हैं…”प्रिया, कक्षा 6 की छात्रा, आज अपने छोटे से स्कूली बैग में किताबों के साथ एक नन्हा पौधा भी लाई थी, पीपल का। वो जानती थी कि ये पेड़ सौ सालों तक जीता है। उसने अपनी ममतामयी दादी की बात याद की,”बेटी, जब तू पैदा हुई थी, तब मैंने तेरे नाम का तुलसी लगाया था, अब तू भी मां के नाम कुछ लगा दे।” प्रिया ने वो पौधा स्कूल के आंगन में रोपते हौले से जमीन से कहा, “मां, ये सिर्फ पेड़ नहीं, ये तुम्हारे लिये एक कविता है, जो हर पत्ता बनकर तुझसे बातें करेगी…”
उसी स्कूल के बाहर हेडमास्टर साहेब जिनकी मां अब इस दुनिया में नहीं थीं, अपने हाथों से बरगद का पौधा लगा रहे थे। उनकी आंखों में एक नमी थी और होंठों पर मुस्कान, “मां, जब तू जिंदा थी, तब छांव देती रही, अब ये पेड़ तेरी जगह लेगा।” इधर, रांची के DC मंजूनाथ भजंत्री के निर्देश पर पूरे जिले में पौधारोपण चल रहा था, सरकारी स्कूलों के आंगन में, बच्चों के स्पर्श में, माताओं की दुआओं में, और हर घर की छत पर एक हरियाली की उम्मीद बोई जा रही थी। “10 लाख पौधे।” ये आंकड़ा नहीं, ये 10 लाख कहानियां थीं। हर पौधा एक मां के नाम था, जिसने सिखाया था चलना, और अब, जिन्हें सिखाया जा रहा था जड़ें पकड़ना। DC मंजूनाथ भजंत्री के इस निर्देश के बाद पौधों के साथ साथ उम्मीदें भी उग रही थीं। धरती फिर से मां बन रही थी, और हर बच्चा… माली।




