Pakur(Jaidev Kumar) : सालों से पाकुड़ की धरती अपने अंदर एक अनमोल धरोहर को छुपाये बैठी थी। जंगलों के बीच पसरी नीरव शांति के बीच जब भूवैज्ञानिकों ने कदम रखा, तो मिट्टी के कणों ने अपने सीने में दबी लाखों कहानियों को फुसफुसाकर कह दिया। भूविज्ञानी डॉ. रंजीत कुमार सिंह और वन रेंजर रामचंद्र पासवान की खोज ने इतिहास के उन धुंधले पन्नों को फिर से खोल दिया, जिसे समय की गर्द ने ढक दिया था। पाकुड़ के बरमसिया और सोलहगड़िया गांव में जब वैज्ञानिकों ने गहन पड़ताल की, तो वहां छिपे पेट्रोफाइड जीवाश्म (लकड़ी में बदल चुके जीवाश्म) ने अपने रहस्यों को उजागर कर दिया। ये अवशेष कोई साधारण टुकड़े नहीं, बल्कि 10 से 14.5 करोड़ वर्ष पुराने एक अनमोल खजाना थे, एक ऐसा वृक्ष, जिसने कभी धरती पर जीवन को सांसें दी थीं, अब पत्थर में तब्दील होकर इतिहास की जीवंत तस्वीर बन चुका था। वर्षों से स्थानीय ग्रामीणों ने इन पत्थरों को दिव्य शक्ति मानकर पूजा की थी। वे समझ नहीं सके कि जो चमत्कारी पत्थर उन्होंने देवत्व के भाव से संजो रखे थे, वह असल में प्राचीन काल की प्रकृति के गवाह थे। सुनें क्या बोले DFO सौरभ चंद्रा और रेंजर रामचंद्र पासवान
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