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तिरंगे के पीछे का असली हीरो पिंगली वेंकैया

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Kohramlive : इस साल 15 अगस्त को जब लाल किले की प्राचीर पर तिरंगा लहराया, तो करोड़ों निगाहें गर्व से उसे निहारी। लेकिन क्या आपको पता है, इस तिरंगे की सोच और रूप देने वाला वो शख्स कौन था? उसका नाम है पिंगली वेंकैया, एक ऐसा नाम, जो किताबों के पन्नों में भी अक्सर छूट जाता है, लेकिन जिसकी मेहनत और दूरदर्शिता ने हमें आज का राष्ट्रीय ध्वज दिया।

आंध्र प्रदेश के मछलीपट्टनम में 2 अगस्त 1876 को जन्मे वेंकैया न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि झंडों के विद्वान भी थे। उन्होंने 1916 से 1921 के बीच दुनिया भर के 190 से ज्यादा झंडों का अध्ययन किया। 30 से ज्यादा डिजाइन बनाये, हर रंग और प्रतीक के पीछे एक सोच रखी। 1921 में विजयवाड़ा कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने महात्मा गांधी को पहला डिजाइन दिखाया, लाल और हरे रंग के साथ। गांधी जी ने इसमें सफेद रंग और चरखा जोड़ने का सुझाव दिया, जो शांति और सभी समुदायों की एकता का प्रतीक बना। 1931 में तिरंगे को पहली बार राष्ट्रीय ध्वज का दर्जा मिला और 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे स्वतंत्र भारत का आधिकारिक ध्वज घोषित कर दिया। चरखे की जगह आया अशोक चक्र, न्याय, प्रगति और गति का संदेश लिये। लेकिन अफसोस! जिस व्यक्ति ने भारत को तिरंगा दिया, उसे न भारत रत्न मिला, न कोई बड़ा सरकारी सम्मान। 1963 में पिंगली वेंकैया गुमनामी में दुनिया छोड़ गये। कई साल बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी किया। आज जब तिरंगा हवा में लहराता है, तो याद रखिये, इसके हर रंग में वेंकैया का सपना, हर फड़कन में उनका संघर्ष छुपा है।

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