(Shwetabh/Bhawna):काश, सबको मिले नीकिता जैसी दीदी…जिसने कर दिखाया गजब…
कहते हैं, अगर खुदा को मनाना है तो अपना निवाला पड़ोसी को खिला दो। कभी खुद की चिंता नहीं की उसने। पेट भर जाए उनका, बस यही दिन रात चिंता सताती रहती है उन्हें। रोज कमाने खाने वाले का हाल सबसे बुरा , वे हो गए हैं दाने-दाने को मोहताज। निवाला लेकर रोज निकलती है घर से और भर जाती हैं गरीब-गुरबों का पेट। वह तब चौंक जाती हैं, जब पाती है कि कई लोग ऐसे हैं, जो भूखे तो जरूर हैं, पर मांग कर खा नहीं सकते। चुपके से अपना जुगाड़ में लगे रहते हैं। ऐसे ही कई घरों को पहुंचा जाती हैं चावल के पैकेट, दाल, सत्तू, प्याज और सब्जी।
उन्हें सुकून तब बहुत मिला जब जावेद ने अपना खून दान कर राजेश की जान बचा ली। शुक्र है खुदा का कि उसने खून के रंग में कोई फर्क नहीं रखा। वर्ना कैसे जान बच पाती राजेश की। अब तो रोज फोन आते हैं प्लाज्मा के लिए। यह काम भी हो जाता है बखूबी। तकलीफ उन्हें तब होती है, जब उनके किसी स्टूडेंट का फोन आता है और यह सुनती हैं कि उसके पापा की नौकरी चली गई। अब कैसे क्या होगा, पढ़ाई लिखाई सब छूट जाएगी। फीस के लिए लगातार स्कूल से फोन पर फोन आते हैं। कभी कभी जी करता है खुद को मिटा लूं। ऐसे स्टूडेंट को जीने की कला का पाठ पढ़ाकर और कुछ का फीस तक जमाकर क्या कमाल कर जा रही हैं नीकिता दीदी। तब वह खूब रोई थी जब किसी से सुनी एक स्कूल के छात्र ने ट्रेन के आगे कूदकर अपनी जान दे दी। मास्क, सैनिटाइजर और अब ऑक्सीजन की दरकार पड़ने पर पहुंचा जाती हैं घर-घर तक। अपने नये इको गाड़ी को एंबुलेंस की जुगाड़ में जुट गईं हैं। जिसके तन पर कपड़ा नहीं, जिसे कफन तक नसीब नहीं, सबकी जरूरत पूरा कर जा रहीं हैं नीकिता दीदी.. काश सबको मिले ऐसी दीदी। प्रचार-प्रसार से कोसों दूर आज की तारीख में रहनुमा और फरिश्ता बनकर सामने आई है नीकिता दीदी। बहुत कुरेदने पर बस वह इतना ही राज खोलती है कि 2007 में उनके ससुर का निधन हो गया था। तब उनके पति के हाथ में कोई काम नहीं था।
उन्हें किसी मददगार या रहनुमा की जरूरत थी। तब किसी ने उनकी मदद नहीं की। कहते हैं न कब किसे क्या देना ये उपर वाले की मर्जी। 2011में उनके हाथ को काम मिला और वे स्कूल में टीचर की नौकरी करने लगे। तब से उनका अरमान कभी थका नहीं। उनका एक ही अरमान था कि जरूरतमंदों की मददगार बनें। उन्हें मुझ पर बहुत भरोसा है। यह काम मेरे हवाले किया। जो भी बन पाता था लोगों की मदद करनी शुरू कर दी। धीरे-धीरे लोग जुड़ते चले गए और देखते ही देखते बन गया मनी त्रिवेदा शंकर एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट। कुछ दिन पहले तो नीकिता दीदी गजब का कर दिखाई। आईये, देखिये क्या बोल गई नीकिता दीदी…











