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Robots के जरिए मानसिक बीमारियों का हो सकता है इलाज, जानें कैसे

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Kohramlive desk : साइंस और टेक्नोलॉजी के विकास में robotics का अपना खास महत्व है। हाल के रिसर्च से यह जानकारी आ रही है कि अब छोटे रोबोट(Robots) की सहायता से मनुष्य की मानसिक बीमारियों का इलाज भी संभव हो सकेगा। ये रोबोट इतने छोटे होंगे कि इन्हें आसानी से मस्तिष्क के अंदर प्रवेश कराया जा सकेगा। पहली नजर में यह किसी साइंस फिक्शन मूवी की कहानी लगती है, लेकिन अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थित बायोनॉट लैब्स इसे हकीकत बनाने में जुटा हुआ है। कंपनी के अनुसार, अगले दो सालों में इंसानों पर इस तकनीक का क्लिनिकल ट्रायल भी किया जाएगा।

इंजेक्शन के जरिए भेजे जाएंगे Robots

माइक्रोरोबोट्स बुलेट के आकार के छोटे मेटल सिलेंडर हैं, जो पहले से प्रोग्राम किए गए रास्ते को फॉलो करते हैं। बायोनॉट लैब्स के CEO माइकल शपिगेलमाकर के अनुसार, ये रोबोट्स इतने सूक्ष्म हैं कि इन्हें इंजेक्शन की मदद से इंसान के शरीर में भेजा जा सकता है। फिर मैग्नेट की मदद से इन्हें दिमाग की ओर गाइड किया जा सकता है। माइकल कहते हैं कि माइक्रोरोबोट्स का सबसे अच्छा उदाहरण 1966 में आई फिल्म फंटास्टिक वोएज है, जिसमें वैज्ञानिकों की टीम एक सूक्ष्म स्पेसशिप में दिमाग के अंदर खून के थक्के को ठीक करने जाती है।

कैसे काम करते हैं माइक्रोरोबोट्स?

बायोनॉट लैब्स ने जर्मनी के मैक्स प्लांक रिसर्च इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर रोबोट्स को विकसित किया है। रोबोट्स को दिमाग की तरफ भेजने के लिए उन्होंने अल्ट्रासोनिक या ऑप्टिकल एनर्जी की जगह मैग्नेटिक एनर्जी का इस्तेमाल किया, क्योंकि यह शरीर को नुकसान नहीं पहुंचाता है।

ये मैग्नेटिक कॉइल मरीज के सिर पर लगाकर इसे एक कंप्यूटर से लिंक किया गया। इसकी मदद से रोबोट्स को सही दिशा में ले जाया जा सकता है और दिमाग के प्रभावित हिस्से को ठीक किया जा सकता है। इस पूरे डिवाइस को आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है और ये MRI स्कैन के मुकाबले 10 से 100 गुना कम बिजली इस्तेमाल करता है।

माइक्रोरोबोट्स करेंगे बड़ी बीमारियों का इलाज

इंटरनेशनल मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, माइक्रोरोबोट्स डैंडी-वॉकर सिंड्रोम का इलाज कर सकेंगे। यह एक जन्मजात बीमारी है जिसके चलते दिमाग के अंदर फ्लुइड भरने लगता है और एक गोल्फ बॉल की साइज तक के सिस्ट भी पनपने लगते हैं। इससे मस्तिष्क पर दबाव बढ़ता है और दिमाग और शरीर का संतुलन नहीं बैठ पाता। माइक्रोरोबोट्स दिमाग में कैंसर ट्यूमर्स, एपिलेप्सी, पार्किंसंस डिजीज और स्ट्रोक का इलाज करने के भी कम आ सकेंगे।

जानवरों पर किया जा चुका है ट्रायल

माइकल का कहना है कि उनकी कंपनी भेड़ों और सुअरों जैसे बड़े जानवरों पर इस तकनीक का प्रयोग कर चुकी है। ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि तकनीक इंसानों के लिए भी सुरक्षित है। बायोनॉट लैब्स को पिछले साल अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) से अप्रूवल मिल चुका है।

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