रांची (रुपम/सत्य शरण) : हमने झारखंड के लिए दर्जनों मेडल लाकर राज्य का नाम रोशन किया, लेकिन अब हम मजदूर हैं। क्योंकि हम मजबूर हैं। यह दर्द है लॉन बॉल (Lawn ball) खिलाड़ी आलोक लकड़ा का। 23 साल का यह युवा खिलाड़ी और उसका परिवार टूट चुका है। उनके सपने बिखर चुके हैं। आइये जानते हैं आखिर क्यों निराश है आलोक।
घर में दर्जनों मेडल खूंटियों पर टंगे हैं, लेकिन घर का चूल्हा ठंडा है। मां की आंखों में लोर है और पिता की आंखों में निराशा। रांची के नामकुम में रहने वाले युवा लॉन बॉल (Lawn ball) खिलाड़ी आलोक लकड़ा और भाई-बहनों ने लॉन बॉल छोड़ कुदाल और फावड़ा थाम लिया है। दो-दो कॉमनवेल्थ समेत 4 इंटरनेशनल और 7 नेशनल गेम खेल चुके आलोक मनरेगा के अलावा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं।
जीत चुका है दो दर्जन से ज्यादा मेडल
कई चैंपियनशिप खेलकर आलोक ने दो दर्जन से ज्यादा मेडल जीता। छोटी बहन अनामिका लकड़ा भी दो चैंपियनशिप खेल चुकी है। असम में अंडर 25 प्रतियोगिता में गोल्ड और झारखंड में हुए चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतकर लाने वाली यह खिलाड़ी हाथ जोड़कर सरकार से स्कॉलरशिप का पैसा मांग रही है। वहीं 2020 में गुवाहाटी में खेलो इंडिया प्रतियोगिता में 3 सिल्वर मेडल जीतकर लाने वाला आलोक का छोटा भाई अभिषेक भी मनरेगा मजदूर बन गया है।
हाल ही में सरकार ने 34 खिलाड़ियों की सीधी नियुक्ति करने की घोषणा की है। इनमें आलोक का भी नाम है। कहा जा रहा है नौकरी के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा, लेकिन आलोक के परिवार का इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा।
खिलाड़ियों की इससे बड़ी दुर्दशा और क्या हो सकती है। दर्जनों मेडल किस काम के, जब मेहनत और मजदूरी ही करनी है। क्या खेल को अपना कैरियर बनाकर इन्होंने अपने भविष्य को अंधेरे में झोंक दिया है? आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दिल्ली और केरल में अपने खेल का लोहा मनवाने वाला यह खिलाड़ी और उसका परिवार आखिर कबतक दुख, गरीबी और उपेक्षा का दंश झेलता रहेगा।
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