Chouparan(Krishna Paswan) : हजारीबाग के चौपारण प्रखंड का बसरिया गांव। वहीं की एक टेढ़ी-मेढ़ी गली से हर सुबह एक दुबला-पतला लड़का गुजरता था, पीठ पर टूटा बैग, हाथों में पिकलबॉल का रैकेट और आंखों में एक ऐसा सपना जो गांव की खिड़की से निकलकर दुनिया तक जाता था। नाम है, जिगर विश्वकर्मा। कुछ लोग कहते थे “अरे छोड़ो बेटा, ये बड़े खेल बड़े शहरों के बच्चों के लिए होते हैं।” पर जिगर ने सुनना कभी सीखा ही नहीं था। बनियाही का वो पुराना मैदान, जहां घास कम और पत्थर ज्यादा थे, वहीं जिगर ने अपने पैर जमाये थे। धूप तपती, बरसात आती, कपड़े भीगते, लेकिन एक बात कभी नहीं बदली, उसके चेहरे पर पसीना और दिल में आग।
मां का आंचल और बापू की चुप्पी
मां, सावित्री देवी, हर रात तवे पर रोटियां सेंकते-सेंकते बस यही कहती, ”बेटा, एक दिन तेरा नाम होगा अखबार में।” पिता विनय विश्वकर्मा, अक्सर चुप रहते। पर जब कभी जिगर थक जाता, वो बस उसका सिर सहला देते, ”तू रुक मत… तू भाग, मैं तेरे पीछे हूं।” मार्च की दोपहर थी। जब AIPA ने जूनियर ओपन के लिए टीम घोषित की, तो मोबाइल की स्क्रीन पर जिगर का नाम चमक रहा था। मां के हाथ से सब्ज़ी गिर पड़ी, पिता की आंखों में चुपचाप आंसू भर आये,
गांव के लोग जुट गये, “बसरिया से कोई बच्चा वियतनाम जायेगा और वो इंडिया की जर्सी पहनेगा!” अब जिगर की फ्लाइट बुक हो चुकी है। पासपोर्ट की फोटो में वही पुरानी मुस्कान है, जो खेतों के बीच भागते हुये गढ़ी गई थी। झारखंड के हर कोने में, पिकलबॉल खेलने वाले बच्चों की आंखों में अब एक तस्वीर है, जिगर की।








