Chouparan(Krishna Paswan) : सुबह की धूप आम दिनों जैसी थी, लेकिन हवा में एक अजीब सी तपिश थी। हजारीबाग के पुराने समाहरणालय चौक पर चुपचाप इकट्ठा हो रही भीड़ में कुछ था—शब्दों से भी ज्यादा तेज और स्याही से भी गहरा। ये कोई भीड़ नहीं थी, ये कलमधारी योद्धाओं की टुकड़ी थी, जो आज अपनी जुबान नहीं, अपनी चुप्पी से चोट दे रही थी। हर पत्रकार की बांह पर काली पट्टी थी, ग़ुस्से की, प्रतिरोध की और लोकतंत्र की आत्मा पर लगे जख्म की गवाही देती हुई। उनके हाथों में बैनर थे, लेकिन आंखों में आग थी। सन्नाटा खुद चीख रहा था—“हम कलम के सिपाही हैं, हमें चुप कराना आसान नहीं।”
यह विरोध सिर्फ एक FIR के खिलाफ नहीं था, यह उस सोच के खिलाफ था जो सवाल पूछने वालों को अपराधी बनाना चाहती है। न्यूज हट के संपादक कुमार कौशलेंद्र पर दर्ज की गई FIR उस शो का परिणाम थी, जो ‘बेबाक’ होकर रिम्स निदेशक की बहाली पर सवाल उठा रहा था। लेकिन जवाब में मिला, एक झूठा मुकदमा, जो अभिव्यक्ति की आजादी को हथकड़ियों में जकड़ने की कोशिश थी। किसी ने कहा, “ये हमला कौशलेंद्र पर नहीं, ये हर उस पत्रकार पर है जो रात में नींद छोड़कर सच ढूंढता है।” किसी ने जोड़ा, “कल को अगर हम चुप रहे, तो अखबारों से पहले हक गायब हो जायेगा।” इस सन्नाटे में दीपक कुमार, नवीन सिन्हा, अरविंद कुमार, अभय कुमार सिंह, प्रमोद खंडेलवाल और मुकेश कुमार जैसे कई नाम थे, हर चेहरा अपने आप में एक किताब, हर आंख एक लड़ाई।












