Kohramlive : सुनहरी किरणों के बीच जब सुबह की पहली रौशनी बालकृष्ण ( Laddu Gopal) के मुकुट पर चमकती है, तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं सूर्यदेव भी उनके चरणों में शीश नवाने आये हों। लड्डू गोपाल के बिना घर का आंगन सूना-सूना सा लगता है। तुलसी चौरा उदास दिखता है, और घर का कोना-कोना वीरान सा महसूस होता है।
पर क्या लड्डू गोपाल को यात्रा पर साथ ले जाना उचित है? धर्मशास्त्र में इसका विशेष उल्लेख है। कहा गया है कि बाल गोपाल नन्हे बालक के समान होते हैं, जिन्हें घर का स्वच्छ वातावरण और नित्य सेवा-सुश्रूषा की जरूरत होती है। उनके भोग, वस्त्र और श्रृंगार में यदि कमी रह जाये, तो उनका मन व्याकुल हो उठता है। यही कारण है कि विद्वान जन लड्डू गोपाल को बार-बार बाहर ले जाने की मनाही करते हैं।
मान्यता है कि बार-बार बाहर ले जाने से घर की बरकत और शुभ ऊर्जा क्षीण हो जाती है। लड्डू गोपाल के प्रति भावना धीरे-धीरे कम होने लगती है, जिससे वे केवल एक प्रतिमा बनकर रह जाते हैं। बालकृष्ण की मुस्कान, उनकी चपलता, उनका वात्सल्य तभी फलता-फूलता है जब हम उन्हें अपने घर के एक कोने में प्रेमपूर्वक स्थापित कर उनकी सेवा में लीन रहें। यदि यात्रा में उन्हें साथ ले जाने की जरूरत हो तो इसका विशेष ध्यान रखें कि उनकी देखभाल उसी भाव से हो जैसी घर में होती है। उनकी जल, भोग और वस्त्र की व्यवस्था में कोई कमी न हो, और यात्रा में भी वह प्रेम और भक्ति का माहौल बना रहे।
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