Khunti : सन्नाटा उस कमरे में नहीं था, जहां SP, DSP और थानेदार एक के बाद एक कुर्सियों पर बैठे थे। सन्नाटा था उनकी नजरों में, उस सख्त साये के इंतजार में जो कुछ ही पलों में दरवाजा खोलेगा और हर फाइल की तह में छिपी सच्चाई बाहर खींच लायेगा। दरवाजा खुला और भीतर दाख़िल हुये रांची प्रक्षेत्र के IG अखिलेश कुमार झा। उनकी आंखों में गर्मी थी, लेकिन मई की दोपहर जैसी नहीं, बल्कि उन फाइलों में छिपी लापरवाही के खिलाफ जलती ईमानदारी जैसी।
उन्होंने मेज पर हाथ रखा, और पहले वाक्य ने जैसे खूंटी के कानून तंत्र में एक झंझावात ला दिया “चार साल से जो केस धूल फांक रहा है, उसका इंसाफ भी क्या रिटायर हो चुका है?” IG अखिलेश झा ने तीन बिंदुओं पर अपनी दृष्टि टिकाई, नक्सल कांड, जहां पत्थरों के बीच अब भी बारूद दबी है। NDPS केस, जिनमें कुछ दरख्तों के पीछे अफीम की परछाईं झूल रही है। महिला और POCSO कांड, जिनकी हर फाइल चीखती है, मगर सुनवाई का इंतजार करती है। IG बोले, “हमारा काम बंद फाइलों को गिनना नहीं, इंसाफ को जिंदा रखना है।” IG झा ने उस भूत की ओर इशारा किया जिसे सिस्टम अक्सर नजरअंदाज कर देता है, “जेल से छूटे नक्सली और अपराधी।” उन्होंने कहा, “ये वही हैं, जो वापस जंगल में जाते हैं और बंदूक फिर से उठाते हैं। अबकी बार सिर्फ FIR नहीं, हर हिलती परछाईं की सत्यापन रिपोर्ट चाहिए।” किसी थानेदार ने कहा, “सर, कुछ केस कोर्ट में पेंडिंग हैं,” IG ने उनकी आंखों में देखा, “कोर्ट में तारीख़ बढ़ी है, इंसाफ नहीं। आप अनुसंधान खत्म करें। बाकी हम देख लेंगे।”
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