Ranchi : कभी धरती का सीना चीरकर कोयला निकालने वाली खदानें जब बंद हो जाती हैं, तो उनके साथ सिर्फ मशीनें नहीं रुकतीं, इलाके की अर्थव्यवस्था और हजारों लोगों की उम्मीदें भी सवालों के घेरे में आ जाती हैं। लेकिन अब झारखंड में कहानी यहीं खत्म नहीं होगी। बंद कोयला खदानों को नई जिंदगी देने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने गिरिडीह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (OCP) और रामगढ़ जिले की करमा OCP को पायलट प्रोजेक्ट के लिये चुना है। रांची में हुई उच्चस्तरीय बैठक में दोनों खदानों के लिये भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर सहमति बनी है।
खदान बंद होगी, विकास नहीं
इस पहल का मकसद खदान बंद होने के बाद उस जमीन को वीरान छोड़ देना नहीं, बल्कि उसे फिर से पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित, सामाजिक रूप से उपयोगी और आर्थिक रूप से उत्पादक बनाना है। योजना के तहत दोनों खदानों के लिये विस्तृत Final Mine Closure and Repurposing Plan तैयार किया जायेगा। इसमें देखा जायेगा कि खदान बंद होने के बाद वहां की जमीन, पानी, पर्यावरण, मौजूद आधारभूत ढांचे और स्थानीय अर्थव्यवस्था का किस तरह बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। बंद खदानों की जमीन पर भविष्य में कई तरह की गतिविधियां विकसित की जा सकती हैं। संभावनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं, पर्यटन और इको-टूरिज्म, कृषि और बागवानी, मत्स्य पालन, कौशल विकास केंद्र, स्थानीय आर्थिक गतिविधियां शामिल हैं। यानी जिस जमीन ने वर्षों तक कोयला दिया, वही जमीन आगे चलकर रोजगार, ऊर्जा और आजीविका का नया जरिया बन सकती है।
करमा OCP के आसपास के 8 गांव भी योजना में शामिल
रामगढ़ की करमा OCP के पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले आठ गांवों को चिन्हित किया गया है। इनमें सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी शामिल हैं। इन गांवों में लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, कमजोर वर्गों और आजीविका के मौजूदा अवसरों का आकलन किया जा रहा है। वहीं, गांव वालों की आवाज भी योजना का हिस्सा होगी। स्थानीय स्तर पर बेहतर समन्वय के लिये Mine Closure Advisory Committee का गठन किया गया है। इसके जरिये खदान बंद होने के बाद इलाके की जरूरतों और स्थानीय लोगों से जुड़े मुद्दों को योजना में शामिल करने की कोशिश की जा रही है। क्योंकि खदान की असली कहानी सिर्फ कोयले की नहीं होती, उससे जुड़ी होती है बस्ती, बाजार, रोजगार और पीढ़ियों की जिंदगी।
DPR में पानी से लेकर पर्यावरण तक का पूरा हिसाब
परियोजना के तहत विस्तृत DPR तैयार की जायेगी। इसमें पर्यावरणीय पुनर्स्थापन, जमीन के उपयोग, जल प्रबंधन, माइन वॉइड मैनेजमेंट और मौजूदा आधारभूत संरचना के पुनर्पयोग जैसे पहलुओं को शामिल किया जायेगा। इसके साथ ही उपयुक्त स्थानों पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं और दूसरे निवेश की संभावनाएं भी तलाश की जायेंगी।
भारत-जर्मनी सहयोग से तैयार होगा मॉडल
यह पूरी पहल भारत सरकार के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था GIZ के सहयोग से चल रही Technical Cooperation on To-be-Closed Coal Mines (TCCM) परियोजना का हिस्सा है। रांची में हुई बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल के साथ राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, GIZ, कोल कंट्रोलर ऑर्गनाइजेशन, CCL और CMPDI के प्रतिनिधि मौजूद रहे। सरकार की नजर सिर्फ इन दो खदानों पर नहीं है। इन पायलट प्रोजेक्ट्स से मिलने वाले अनुभवों के आधार पर ऐसा मॉडल विकसित करने की कोशिश है, जिसे भविष्य में देश की दूसरी बंद होती कोयला खदानों में भी अपनाया जा सके। TCCM परियोजना मार्च 2030 तक चलेगी।







