Kohramlive : बॉलीवुड की चमचमाती दुनिया में कई चेहरे आये और गये, लेकिन धर्मेंद्र वो नाम है जो सिर्फ पर्दे पर नहीं, बल्कि लोगों की रगों में धड़कता है। ना कोई गॉडफादर, ना कोई सहारा, बस सपनों का धुआं, हौसले की आग और दिल में धधकती मुंबई देखने की तड़प। पंजाब के लुधियाना के साहनेवाल गांव की मिट्टी में खेला-पला एक लड़का, जिसकी आंखों में दुनिया से बड़ी ख्वाहिशें थीं। उसी ख्वाहिश ने उसे गांव के छोर से उठाकर मुंबई की भीड़ में पहुंचा दिया।
रियलिटी शो इंडियन आइडल 11 में जब धर्मेंद्र ने अपनी जिंदगी की शुरुआती रातों का जिक्र किया, तो पूरा स्टूडियो थम गया। उनके शब्द मानो पर्दे के पीछे छिपी फिल्म का असली सच उघाड़ रहे हों, “मुंबई में मेरे पास रहने को घर नहीं था। मैं गैरेज में सोता था, वहां से सुबह उठकर ड्रिलिंग फर्म में पार्ट टाइम काम करता था। महीने में 200 रुपये मिलते थे और कभी-कभी वो भी कम पड़ जाते थे।” ये कहकर वो मुस्कुराये जरूर, लेकिन उनकी मुस्कान में वो दर्द साफ दिखा, जो सिर्फ संघर्ष की रातों ने जन्म दिया था।
रेलवे पुल पर बैठकर घंटों देखा करते थे भविष्य…
धर्मेंद्र ने बताया कि वो बचपन में गांव के पास के रेलवे पुल पर बैठ जाते थे। गाड़ियों की आवाजें, हवा की ठंडक और सपनों का शोर वहीं बैठकर वो मुंबई की कल्पना करते, वो शहर, जहां एक दिन उनकी किस्मत उन्हें भी पहचान देगी।1960 में जब उनकी पहली फिल्म रिलीज हुई, तो फिल्मों की दुनिया ने पहली बार महसूस किया, ये चेहरा सिर्फ सुंदर नहीं, इसमें मिट्टी की खुशबू है, जज्बात हैं, आग है। 60 और 70 के दशक में धर्मेंद्र घर-घर का नाम बन चुके थे। उनका एक्शन दमदार था, रोमांस सादगी से भरा और ड्रामा दिल को छू लेने वाला। ‘फूल और पत्थर’ में उनकी भूमिका ने उन्हें सिर्फ स्टार नहीं बनाया, उन्हें पहला फिल्मफेयर नॉमिनेशन दिया और दर्शकों का बेइंतहा प्यार। इसके बाद धरम पाजी ने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। हर फिल्म के साथ वो और ऊंचे, और चमकदार होते चले गये।






