Ranchi : रांची की धरती तप रही थी। सूरज भले आसमान में था, पर असल तपिश उन गांवों की थी, जहां औरतें मटकों को सिर पर लिये मीलों चलती थीं, और बच्चे बूंद-बूंद को तरसते थे। वहीं, शहर की चुप गलियों में शौचालयों के वादे, कागजों पर मुस्कुराते थे। इन्हीं सवालों के बीच, समाहरणालय के सभागार में एक आवाज गूंजी, “अबुआ ग्रुप से आई हर शिकायत, अब दफ्तर में नहीं, दिल में दर्ज होगी।” यह आवाज थी, रांची के DC मंजूनाथ भजन्त्री की। उनकी आंखों में प्रशासन नहीं, एक प्रण था, “हर घर, हर आंगन तक पानी पहुंचे और हर बच्चा स्वच्छता में पल बढ़ाये।”
ग्राम वॉश कोऑर्डिनेटर सीमा देवी कहती है, “सर, हम तो कहते-कहते थक गये, पर आज पहली बार लगा कोई ऊपर बैठा इंसान, हमारी आवाज सुन रहा है।” पारा शिक्षक राकेश की आंखें भर आती हैं, जब सुनता है, “जिन्हें नहीं मिला शौचालय, वे सरकार से नहीं, खुद से बनायें, शुरुआत उन लोगों से हो, जो समाज के रोल मॉडल हैं।” बैठक में ठोस कचरा प्रबंधन पर बातें हुई। पुराने स्कूल भवन, जो कभी बच्चों की हंसी से गूंजते थे, अब ‘सेग्रीगेशन शेड’ बनेंगे, ताकि गांव साफ हो, दिल साफ हो। उसी वक्त, DC मंजूनाथ भजन्त्री की कलम उठती है। एक दिशा, एक दस्तखत और एक बदलाव की दस्तक।










