Ranchi : झारखंड की राजधानी रांची में इन दिनों सड़कों पर हजारों सपने बैठे हैं। किसी की आंखों में सरकारी नौकरी का सपना है, किसी के घरवालों की उम्मीद है और किसी के पास बस यही भरोसा कि मेहनत की कीमत एक दिन जरूर मिलेगी। JPSC और JSSC की परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर छात्रों का आक्रोश इसी टूटते भरोसे की कहानी है। आंदोलनकारी छात्र लगातार एक बड़ी मांग उठा रहे हैं, पूरे मामले की जांच CBI से कराई जाये। जिस युवा ने सालों तक किताबों के साथ जिंदगी गुजार दी हो, रात-रात भर पढ़ाई की हो और परीक्षा के बाद परिणाम का इंतजार किया हो, उसके लिये भर्ती परीक्षा सिर्फ एक इम्तिहान नहीं होती। वह उसके परिवार की उम्मीद होती है। वहीं, जब उसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठे, तो सवाल सिर्फ आयोग से नहीं, पूरे सिस्टम से होने लगता है। लेकिन इस बहस का दूसरा पहलू भी है। क्या हर CBI जांच का मतलब त्वरित न्याय है? या फिर CBI की जांच के साथ अदालतों की लंबी प्रक्रिया, कानूनी चुनौतियां, चार्जशीट, ट्रायल और अपील का एक ऐसा रास्ता भी आता है, जिसे पूरा होने में कई साल लग सकते हैं? यही वह सवाल है, जिसे झारखंड के मौजूदा आंदोलन के बीच नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या हर CBI जांच का मतलब त्वरित न्याय है?
छात्र CBI की मांग कर रहे हैं। सरकार का रुख है कि मौजूदा मामले में राज्य की CID और SIT जांच कर रही है और जांच को समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार ने कार्रवाई को तेज करने के लिये फास्ट-ट्रैक व्यवस्था की दिशा में भी कदम बढ़ाये हैं। ऐसे में बहस को केवल “CBI बनाम CID” तक सीमित करना शायद तस्वीर का छोटा हिस्सा देखना होगा। बड़ा सवाल है कि क्या जांच निष्पक्ष होगी? क्या दोषी तक पहुंचेगी? क्या रिपोर्ट समय पर आयेगी? और क्या दोष सिद्ध होने पर सजा भी होगी? युवाओं को आखिरकार यही चाहिये। एजेंसी का नाम नहीं। न्याय का परिणाम। छात्रों की सोच भी साफ है। उन्हें लगता है कि मामला जितना गंभीर है, जांच भी उतनी ही स्वतंत्र होनी चाहिये। केंद्रीय एजेंसी की जांच से उन्हें यह भरोसा मिल सकता है कि जांच स्थानीय प्रशासनिक दायरे से बाहर जाकर होगी। यह मांग भावनात्मक भी है। क्योंकि एक अभ्यर्थी के लिये परीक्षा में गड़बड़ी का मतलब सिर्फ एक गलत परिणाम नहीं। इसका मतलब हो सकता है, एक साल गया। दो साल गये। उम्र की सीमा करीब आ गई और फिर वही सवाल, अब क्या करें? यही बेचैनी रांची की सड़कों पर दिखाई दे रही है। लेकिन दूसरा सवाल भी कम बड़ा नहीं, CBI के बाद क्या? यहीं से कहानी थोड़ा कठिन मोड़ लेती है। अगर आज जांच CBI को सौंप दी जाये, तो क्या कल ही रिपोर्ट आ जायेगी? नहीं। किसी भी गंभीर आपराधिक मामले में जांच, सबूत, पूछताछ, चार्जशीट और फिर अदालत में ट्रायल जैसी प्रक्रियाएं होती हैं। अदालतों में कानूनी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। झारखंड हाईकोर्ट की अलग-अलग कार्यवाहियों में CBI से जुड़े मामले और भ्रष्टाचार/आर्थिक अपराध से संबंधित मुकदमे लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं। इसलिये यह कहना सही नहीं होगा कि CBI जांच अपने-आप में त्वरित न्याय की गारंटी है। CBI हो या CID, आखिरी कसौटी नतीजा है।
सरकार का रास्ता : परीक्षा रद्द, जांच तेज, फिर फास्ट ट्रैक
हालिया घटनाक्रम में सरकार ने छात्रों की एक बड़ी मांग पर फैसला लेते हुये JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने का ऐलान किया। इसके साथ TDPL के जरिये 2014 के बाद कराई गई परीक्षाओं को लेकर भी जांच की बात सामने आई। JPSC की 14वीं सिविल सेवा परीक्षा और कुछ अन्य परीक्षाओं पर भी कार्रवाई की घोषणा हुई है। यानी सरकार ने आंदोलन की सबसे बड़ी मांगों में से एक पर कदम बढ़ाया है। इसी फैसले के बाद आंदोलनकारी नेता देवेंद्र नाथ महतो ने 16 दिन की भूख हड़ताल समाप्त की, हालांकि उन्होंने साफ किया कि आंदोलन खत्म नहीं हुआ है। आगे की लड़ाई भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और सुधार को लेकर जारी रहने की बात कही गई है। यह बताता है कि सरकार और छात्रों के बीच संवाद की गुंजाइश अभी बनी हुई है।
CBI चाहिये या तेज न्याय? शायद जवाब दोनों के बीच है
छात्र CBI मांग रहे हैं। सरकार CID की जांच पर भरोसा जता रही है। इन दोनों के बीच एक तीसरा रास्ता भी दिखाई देता है, पारदर्शी, समयबद्ध और अदालत की निगरानी में ऐसी जांच, जिसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हो और कार्रवाई दिखाई दे। अगर CID 90 दिन में तथ्य सामने रख देती है और दोषियों तक पहुंचती है, तो छात्रों का भरोसा मजबूत होगा। अगर जांच में सवाल उठते हैं, तो सरकार के पास CBI जैसे विकल्प पर विचार करने का रास्ता खुला रह सकता है। क्योंकि लोकतंत्र में जिद से ज्यादा जरूरी है, जनता का भरोसा। आखिर में बात नौकरी की नहीं, भरोसे की है झारखंड का युवा बहुत कुछ सह चुका है। परीक्षा का इंतजार। परिणाम का इंतजार। फिर विवाद। फिर आंदोलन। फिर जांच और फिर अदालत। अब वह इस चक्र को टूटते देखना चाहता है। उसे सिर्फ यह नहीं चाहिये कि परीक्षा रद्द हो जाये। उसे चाहिये कि अगली परीक्षा पर कोई उंगली न उठा सके। उसे चाहिये कि उसकी मेहनत का फैसला किसी सिफारिश से नहीं, उसकी काबिलियत से हो। वहीं, उसे यह भरोसा चाहिये कि जिस सरकार ने उसकी आवाज सुनी है, वह न्याय की आखिरी सीढ़ी तक उसके साथ खड़ी रहेगी। सरकार ने पहला बड़ा कदम उठा दिया है। अब निगाहें जांच पर हैं। क्योंकि झारखंड के युवा शायद अब एक ही बात कह रहे हैं, “परीक्षा फिर ले लीजिये सरकार, मगर इस बार भरोसा मत टूटने दीजिये।”
JPSC की शुरुआती परीक्षायें : जब नौकरी की परीक्षा बनी मुकदमे की कहानी
झारखंड नया-नया राज्य बना था। सरकारी नौकरियों के सपने भी नये थे और उन्हें पूरा कराने वाली संस्थाएं भी नई थीं। इसी दौर में JPSC की शुरुआती सिविल सेवा परीक्षाओं को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आये। कॉपियों के मूल्यांकन, नंबरों में कथित हेरफेर और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। मामला जांच और अदालत तक पहुंचा। यही वह दौर था, जिसने झारखंड में भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता को लेकर पहली बड़ी बहस खड़ी की। आज, इतने वर्षों बाद जब JPSC-JSSC को लेकर फिर सड़क पर आंदोलन है, तो पुरानी फाइलों का जिक्र होना स्वाभाविक है। सवाल वही है, क्या झारखंड की भर्ती व्यवस्था ने अतीत से पर्याप्त सबक लिया? और अगर नहीं लिया, तो अब वह कौन-सा रास्ता होगा जो व्यवस्था में स्थायी सुधार ला सके?
साहिबगंज का अवैध खनन : जांच बड़ी, सवाल भी बड़े
झारखंड में CBI जांच की चर्चा सिर्फ भर्ती परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। साहिबगंज के अवैध खनन से जुड़े मामलों ने भी राज्य की राजनीति और प्रशासन को लंबे समय तक घेरा है। इस मामले में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई, अदालतों की निगरानी और जांच के अलग-अलग पहलू सामने आते रहे हैं। झारखंड हाईकोर्ट की विभिन्न कार्यवाहियों में अवैध खनन से जुड़े मामले लगातार सूचीबद्ध होते रहे हैं। यानी मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का भी हिस्सा है। लेकिन यहां भी वही सवाल सिर उठाता है, जांच कब पूरी होगी और अंतिम न्याय कब मिलेगा? यही वह फर्क है, जिसे समझना जरूरी है। जांच किसी भी एजेंसी को सौंपना एक प्रक्रिया की शुरुआत है। न्याय की मंजिल नहीं।








