एक ऐसा गांव जहां दुल्हन की मांग का सिंदूर धो देता है दारू

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रांची (सत्य शरण मिश्र) : नशा फटता है तो हर रोज सुबह मेरा माथा छूकर कसम खाते हैं कि अब जिंदगी में कभी चुलैया-दारू नहीं पीएंगे। पर ऐसी कोई रात नहीं गुजरती, जब आप हिलते-डुलते-डगमगाते और गिरते-पड़ते घर नहीं आते। क्यों मेरी और अपने बच्चों की जिंदगी से खेल रहे हैं। मुझ पर तरस नहीं आती, तो कम से कम बच्चों पर तो रखें मोह-माया। भगवान न करे, अगर कुछ हो गया तो आपके बच्चे हो जाएंगे अनाथ। मेरे नसीब में क्या है यह तो मुझे पता है। याद है, उस रात उल्टी करते-करते मुंह से थोड़ा खून भी आ गया था। भागे-भागे गये थे डॉक्टर के पास। क्या बोला था डॉक्टर यह भी याद है या भूल गये? साफ-साफ दारू पीने से मना किया था। क्यों रोज जहर पीते हैं? कुछ ही दिन बीते होंगे कि गोद में लिये पति का सिर सहलाते हुए सिर्फ इतना ही बोली-लाख बार आपको मना करते थे। नहीं सुने न माने। अब तो आप जाने वाले हैं। इन तीनों छउवा को कौन पालेगा अब। आपको अच्छा लगेगा कि मुझे अकेली देख कोई सीटी मारे, तो कोई हमदर्दी जताने आये। हे भगवान, सबका मति मर गया है।

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कुछ तो ऐसा करो कि शासन-प्रशासन जागे और दारू की भट्ढी चकनाचूर हो जाये। यह दुखड़ा अकेली लूसी तिग्गा का नहीं, इसकी जैसी 249 और बेवाओं का भी है। कैसे एक हट्टा-कट्टा इंसान दारू पीकर अपने खून को पानी बना लेता है और उस पानी में एक हंसता-खेलता परिवार बह जाता है। किसी की किडनी, किसी का लीवर फेल, किसी को टीबी तो किसी का फेफड़ा काम करना बंद कर देता है। धड़कता दिल भी चुपके से न जाने कब खामोश हो जाता है और जगह पाता है ताबूत या कब्र में। ये कहानी है राजधानी रांची से सटे मांडर प्रखंड के ब्रांबे गांव का। इस गांव की आबादी बमुश्किल कुछ हजार में होगी, पर यहां बेवाओं की संख्या 250 के पार है। गांव के मुखिया जयवंत तिग्गा भी मानते हैं कि अगर गांव के नौजवान दारू से तौबा कर लें, तो उनसे बेहतर खुशहाल गांव और नहीं होगा, क्योंकि यहां रहने वाला हर कोई मेहनती और ईमानदार है। खेती-बारी या अन्य काम कर खुशहाल जिंदगी हासिल तो कर लेता है, लेकिन उसकी जिंदगी में ग्रहण लगा देता है सिर्फ दारू। अब तो यह आलम है कि उनके गांव के लोग विधवाओं का गांव कहकर पुकारते हैं। सरकार को चाहिए कि इस ओर सख्ती से निहारे और दारू से उजड़ते गांव को बसाने की दिशा में सोचे। आइए सुनते हैं कुछ बेवाओं की दारुण कथा…

गांव के मुखिया जयवंत तिग्गा कहते हैं कि गांव में विधवाओं की संख्या ज्यादा है। यहां के गरीब लोगों के लिए शराब एक व्यवसाय है। उसी शराब ने ब्रांबे पर विधवा गांव का कलंक लगा दिया। लोग शराब पीकर बीमार होते हैं। फिर डॉक्टर के बजाए भगत के पास जाते हैं और उनकी मौत हो जाती है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्रों के शोध के मुताबिक इस गांव के हर तीसरे घर में एक विधवा महिला है। इसपर मुखिया क्या कहते हैं सुनिये।

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