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फलाहारी बाबा के बैकुंठ उत्सव में झलका अजीब सा नजारा…

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Chouparan(Krishna Paswan) : फलाहारी बाबा जिसने फलाहार को अपना तप बना लिया, जिसने रामभक्ति को अपना प्राण और जिसने अपने भक्तों के लिये बैकुंठ को यहीं धरती पर उतार दिया। चौपारण के बिगहा की शांत वादियों में, जहां पहाड़ के साये झूमते हैं और पेड़ों की शाखें जैसे किसी मंत्र का जाप करती हैं, वहीं बसे हैं “हनुमंत सेवा संस्थान” के द्वार। और वहां समाधिस्थ हैं, फलाहारी बाबा, जिन्हें लोग आलू बाबा के नाम से भी जानते हैं। बैकुंठधाम उत्सव के तीसरे दिन रामायण के मंत्र, कीर्तन की लहरें भक्तों की आत्मा को झकझोर गई। अखंड रामचरितमानस पाठ के हर शब्द में बाबा की तपस्या, उनकी भक्ति, उनकी ऊर्जा समाई थी। बाबा फलाहारी—एक संन्यासी, जिनकी आंखों में करुणा, और माथे पर तप का तेज था। जिन्होंने भूख को फलाहार में बदला और सुख को सेवा में। कश्मीर से करगिल, प्रयाग से अयोध्या तक, उन्होंने भक्ति के धागों से मंदिरों को बांधा। उनकी सेवा कोई प्रदर्शन नहीं, एक मूक आह्वान थी—“भक्ति से शक्ति, शक्ति से प्रकाश, और प्रकाश से जनकल्याण।” उन्हीं के शिष्य आनंद चंद्रवंशी कहते हैं—“बाबा सिर्फ गुरु नहीं, वो हमारे जीवन के सार थे।”

इस बार फिर बाबा की याद में श्रद्धा का सैलाब उमड़ा। हर चेहरा श्रद्धा से भीगा, हर आंख में भावभीनी स्मृति। बच्चे हों या बुज़ुर्ग, महिलाएं हों या साधु, हर किसी ने समाधि पर सिर झुकाया। मुखिया प्रतिनिधि राजदेव यादव, संजय सिंह, आनंद चंद्रवंशी और सैकड़ों भक्तों ने बाबा के भजन में स्वर मिलाया। बाबा की कुटिया अब मंदिर है, उनकी मूर्ति अब श्रद्धा का केंद्र और उनकी स्मृति अब चेतना का दीप। उन्होंने इटखोरी के भद्रकाली मंदिर में राम का वास कराया, मरहेड़ी में कात्यायनी की शक्ति जगाई, और बिगहा को हनुमत भक्ति का गढ़ बना दिया। उनकी भू समाधि, 21 मई 2022, कोई अंत नहीं, एक नई शुरुआत थी। रामायण के आखिरी दोहे के साथ जब शाम ढली, तो सूरज जैसे बाबा को फिर से प्रणाम करने आया। बैकुंठ अब बिगहा में है, जहां बाबा फलाहारी अमर हैं—भक्तों के प्राणों में।

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