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जब मांझी ही नाव डुबोए, उसे कौन बचाये… देखिये रिटायरमेंट से एक दिन पहले क्या बोल गये IG सुधीर

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रांची : जितना जांबाज, उतना ही जिंदादिल इंसान। नाम है सुधीर कुमार झा। यह हैं झारखण्ड पुलिस में जैप के आईजी। 31 दिसंबर को इनका कार्यकाल खत्म होगा और हो जायेंगे रिटायर। मन में सिर्फ एक टीस कि अगर पुलिस अपना काम बखूबी और ईमानदारी से करे, तो बदला जा सकता है अपराधी, उग्रवादी और नक्सलियों का मन। आम तौर पर खाकी को अपना जानी दुश्मन मानने वाले अपराधी, उग्रवादी, नक्सली के ये हैं दोस्त। कभी बीहड़ या जंगल में अकेले आने-जाने से न डरे, न हिचके। जो भी सामने आया, उसकी पूरी जिंदगी को बदल डाला। बात-बात पर गोली-बम दागने वाले हाथ इनके सामने जुड़ जाया करते। महकमे के सहयोगी भी इन्हें दयालु और बढ़िया अफसर मानते हैं। किसी को दंड देना इनका मिजाज नहीं। उनकी चूक और भूल को बता कर माफ कर देना इनकी फितरत है। शायद यही वजह है कि नौकरी से बरखास्त कर दिये गये 32 पुलिसकर्मियों को अभय दान देकर फिर से नौकरी में बहाल करवा दिया। बरखास्त होने वाले ये पुलिसकर्मी कोई बड़े गुनाहगार नहीं थे। इनसान के साथ-साथ बेजुबान जीव जंतुओं से गजब का लगाव। बाहर पहरेदार होते हैं बॉडीगार्ड और घर के आंगन के उनके सच्चे पहरेदार हैं हंस, खरगोश, कुत्ते। मीडिया के पन्नों में भले इन्हें प्रमुखता से स्थान न मिला हो, पर जंगलों में हर कोई इनकी कद्र करता है चाहे वह आम जनता हो, या खूंखार उग्रवादी। कई खूंखार उग्रवादी खुद कबूल करते हैं कि उनके मन को बदल डाला आईजी सुधीर कुमार झा ने। एक दिन बाद कुछ दिन करेंगे आराम, फिर वही ललक लेकर उतरेंगे गांव-देहात और सुदूर जंगल जमीन पर। सबका दुखड़ा सुनना और उसे दूर करना उनको सुकून देता है। यह क्या गजब का बोल गये आईजी सुधीर।

ललाट पर बड़ा सा टीका, धीमी चाल, हंसमुख चेहरा, गुस्सा कोसों दूर, डांटना, फटकारना, दुत्कारना या फिर निर्दोष को सता कर जेल भेज देना इनकी पहचान कभी नहीं रही। बात-बात में बोल गये कि जब 1 हजार लोगों को मारने की प्रतिज्ञा लेने वाले अंगुलीमाल के मन को बदला जा सकता है, तो अपने समाज में ही जन्मे और भटके लोगों के मन को कैसे नहीं बदला जा सकता है। कोशिश तो शुरू हो, नतीजा सचमुच अच्छा आयेगा। 36 साल पुलिस सेवा में गुजारने के बाद इन्होंने बहुत करीब से पुलिसिंग को समझा है। वह तब दंग रह जाते थे, जब घटना चाहे चोरी की हो, पॉकेटमारी, डकैती, लूट या मर्डर हो सबमें एक ही नाम उभर कर सामने आता है और उसकी ही खोज होती है और उसे पकड़ ठूंस दिया जाता है सलाखों के पीछे। ऐसे छोटे-बड़े कई अपराधी और उग्रवादियों को एसपी रहते रिमांड पर लेकर पूछताछ की, तो माथा ठनक जाता था। बिगड़े को सुधार देना यह पुलिस सेवा का मकसद होना चाहिए। ज्यादातर मामलों में देखा गया कि बिना अपराध के केस पर केस लाद देना, मतलब सुधरे को बिगाड़ देना। यह कैसी पुलिसिंग। रिटायरमेंट के बाद शेष जिंदगी अगर उनका दीन दुखियों की सेवा में और उनका भला करने में गुजरे तो यह चौंकाने वाला नहीं होगा।

एसके झा : एक परिचय

झारखंड के जैप आइजी सुधीर कुमार झा 36 वर्षों की सेवा के उपरांत 31 दिसंबर 2020 को सेवानिवृत्‍त हो गए। बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन से इनकी नियुक्ति डीएसपी के पद पर हुई थी। वह बिहार के पूर्णिया जिले के सिली गांव के रहने वाले हैं। उनका जन्‍म एक सामान्‍य मध्‍यम परिवार में हुआ। उनके पिता स्‍व. गोपाल झा थे। एसके झा ने प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव के स्‍कूल में ही प्राप्‍त की। इसके बाद आदर्श मध्‍य विद्यालय, सरसी में  छठी कक्षा तक पढ़े। इसी समय नेतरहाट के लिए परीक्षा दी और छठी कक्षा के लिए उनका चयन हो गया। छठी से बारहवीं तक की पढ़ाई उन्‍होंने नेतरहाट से की। पटना कॉलेज से ग्रेजुएशन किया। पटना यूनिवर्सिटी से भूगोल में एमए किया। पढ़ाई में तीसरी कक्षा से एमए तक उन्‍हें स्‍कॉलरशिप मिली। डॉक्‍टरेट के लिए भी फेलोशिप मिलनी थी। इसी बीच उन्‍होंने सर्विस ज्‍वाइन कर ली।

बचपन से ही सुधीर कुमार झा की पूजापाठ में रुचि रही है। ईश्‍वर में अटूट आस्‍था रही है। आज भी उनकी दिनचर्या में पूजा-पाठ शामिल है।

कोहराम लाइव के लिए कैमरामैन रंजीत के साथ रूपम की रिपोर्ट

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