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सुभाष चंद्र बोस की जयंती आज, आइये जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी रोचक बातें

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कोहराम लाइव डेस्‍क : स्वतंत्रता सेनानियों में से एक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपने क्रांतिकारी तेवरों से ब्रिटिश राज को भी हिलाकर रख दिया था। लोग उन्हें ‘नेताजी’ कहकर बुलाया करते थे। उन्होंने देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। एक वक्‍त ऐसा भी था जब वो देश में अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव मैदान में भी उतरे थे। आज उनकी 125वीं जयंती है। नेताजी का जन्म 23 जनवरी, 1897 को ओडिशा के कटक में हुआ था। उस समय कटक बंगाल प्रेसिडेंसी का हिस्सा हुआ करता था। इस साल होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को देखते हुए सभी पार्टियां नेताजी की जयंती को धूमधाम से मनाने की तैयारियों में जुटी हुई है। इस साल सरकार ने फैसला लिया है कि अब हर साल 23 जनवरी यानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन को पराक्रम दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

जयंती के मौके पर आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी कुछ महत्‍वपूर्ण बातें

साल 1937 का वो दौर था जब कांग्रेस ने सरकार बनाई और जमीन पर उतर कर खूब काम करने लगे। उस वक्‍त वाम राजनीति भी अपने शि‍खर पर थी। तब यह कहा जा रहा था कि यही सही समय है जब आंदोलन को अमली जामा पहनाकर अंग्रेज सरकार की चूलें हिला दी जाएं और पूर्ण स्‍वराज हासिल किया जाए।

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नेताजी से जुड़े रोचक बातें 

सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। जानकीनाथ कटक के मशहूर वकील थे।

प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थीं, जिसमें 6 बेटियां और 8 बेटे थे। सुभाष उनकी नौवीं संतान और पांचवें बेटे थे ।

कटक में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने रेवेनशा कॉलिजियेट स्कूल में दाखिला लिया। जिसके बाद उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की। 1919 में बीए की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी से पास की, यूनिवर्सिटी में उन्हें दूसरा स्थान मिला था।

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उनके पिता की इच्छा थी कि सुभाष आईसीएस बनें। उन्होंने अपने पिता की यह इच्छा पूरी की। 1920 की आईसीएस परीक्षा में उन्होंने चौथा स्थान पाया मगर सुभाष का मन अंग्रेजों के अधीन काम करने का नहीं था। 22 अप्रैल 1921 को उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

सुभाष चंद्र बोस की पहली मुलाकात गांधी जी से 20 जुलाई 1921 को हुई थी। गांधी जी की सलाह पर वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए काम करने लगे।

भारत की आजादी के साथ-साथ उनका जुड़ाव सामाजिक कार्यों में भी बना रहा। बंगाल की भयंकर बाढ़ में घिरे लोगों को उन्होंने भोजन, वस्त्र और सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का साहसपूर्ण काम किया था। समाज सेवा का काम नियमित रूप से चलता रहे इसके लिए उन्होंने ‘युवक-दल’ की स्थापना की।

भगत सिंह को फांसी की सजा से रिहा कराने के लिए वे जेल से प्रयास कर रहे थे। उनकी रिहाई के लिए उन्होंने गांधी जी से बात की और कहा कि रिहाई के मुद्दे पर किया गया समझौता वे अंग्रेजों से तोड़ दें। इस समझौते के तहत जेल से भारतीय कैदियों के लिए रिहाई मांगी गई थी। गांधी जी ब्रिटिश सरकार को दिया गया वचन तोड़ने के लिए राजी नहीं हुए, जिसके बाद भगत सिंह को फांसी दे दी गई। इस घटना के बाद वे गांधी और कांग्रेस के काम करने के तरीके से बहुत नाराज हो गए थे।

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अपने सार्वजनिक जीवन में सुभाष को कुल 11 बार कारावास की सजा दी गई थी। सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई 1921 को छह महीने का कारावास दिया गया था। 1941 में एक मुकदमे के सिलसिले में उन्हें कलकत्ता की अदालत में पेश होना था, तभी वे अपना घर छोड़कर चले गए और जर्मनी पहुंच गए। जर्मनी में उन्होंने हिटलर से मुलाकात की। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के लिए उन्होंने आजाद हिन्द फौज का गठन किया और युवाओं को ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा भी दिया।

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