तालाब से निकलीं तो जिंदगी खामोश हो चुकी थी
हादसे की खबर मिलते ही आसपास के लोग दौड़ पड़े। ग्रामीणों ने दोनों बच्चियों को पानी से निकालने की कोशिश शुरू की। काफी प्रयास के बाद उन्हें बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। दोनों की मौत की खबर जैसे ही परिवारों तक पहुंची, घरों में कोहराम मच गया। जिस गांव में कुछ देर पहले तक बच्चों की आवाजें गूंज रही थीं, वहां अचानक मातम पसरा था। मां-बाप की आंखों के सामने उनकी बेटियों की तस्वीर थी और दिल में बस एक सवाल, आखिर यह कैसे हो गया?
जब जाति पीछे छूट गई और दोस्ती आगे निकल गई
इसके बाद जो हुआ, उसने इस दर्दनाक घटना को एक अलग अर्थ दे दिया। सुप्रिया चौधरी परिवार से थी और सुहानी यादव परिवार से। दोनों अलग-अलग जातीय परिवारों की बेटियां थीं, लेकिन उनकी दोस्ती में कभी यह फर्क आड़े नहीं आया। अंतिम विदाई के वक्त दोनों परिवारों ने भी इसी दोस्ती को सबसे बड़ा मान दिया। परिजनों और ग्रामीणों की सहमति से दोनों सहेलियों को एक ही कब्र में सुपुर्द-ए-खाक किया गया। वह दृश्य जिसने भी देखा, उसकी आंखें भर आईं। दो छोटी-सी जिंदगियां, एक जैसा स्कूल, एक जैसी उम्र, एक-दूसरे का साथ. और आखिर में एक ही कब्र। आज नवावचक गांव में सुप्रिया और सुहानी नहीं हैं, लेकिन उनकी दोस्ती की कहानी हर जुबान पर है। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों ने जिंदगी में एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ा और मौत भी उन्हें अलग नहीं कर सकी। दोनों परिवारों का यह फैसला सामाजिक सौहार्द और इंसानियत की मिसाल बन गया है।







