Ormanjhi(Kuldeep/Aamitabh) : रात अभी खत्म भी नहीं हुई थी, और अंधेरे में पहाड़ से उठते धुएं ने गांव वालों को बेचैन कर दिया। आग थी… वह भी उस बड़का पहाड़ पर, जहां तक पहुंचना भी इंसान की हिम्मत का इम्तिहान लेता है। सुबह के चार बजे थे। जब और लोग नींद में डूबे थे, तब मुखिया रमेश बेदिया ने गांव के बीस-पच्चीस जांबाजों को आवाज दी, “चलो… अपने जंगल को बचाना है।” 1000 फीट ऊंचे पहाड़ पर, बिना किसी आधुनिक साधन के, ये ग्रामीण चढ़े। कंधों पर न कोई फायर ब्रिगेड, न कोई मशीन…बस जज्बा, जुगाड़ और जंगल से तोड़ी गई डालियों से बने झाड़ू। 400 एकड़ में फैली आग भयानक थी। लेकिन ग्रामीणों ने हार नहीं मानी। डालियों से सूखे पत्तों को अलग करते गये… आग की लपटों को बीच से तोड़ते गये, जहां आग बढ़ती, वहीं अपना ‘जुगाड़ू मोर्चा’ खड़ा कर देते। सात घंटे तक बिना थमे, बिना थके, ओरमांझी के ये सपूत आग से जूझते रहे। आखिरकार, उनका हौसला रंग लाया, आग थम गई। जंगल बच गया। गांव की सांसें फिर से चल उठीं। मुखिया रमेश बेदिया के साथ ग्राम प्रधान गोपाल राम बेदिया, फुलेंद्र सोहराय, राम लखन बेदिया और तमाम ग्रामीणों ने यह दिखा दिया कि असली हीरो वही होते हैं, जो बिना तमगे के, अपने धरती मां के लिये जान की बाजी लगा देते हैं।








