Chouparan(Krishna Paswan) : जहां सड़कें खतरे से गुजरती हैं, वहीं आस्था का एक दीपक यात्रियों के दिलों को रोशन करता है, हाथिया बाबा मंदिर। यह मंदिर सिर्फ सुरक्षित यात्रा का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता का ऐसा उदाहरण है जिसने जाति-पांति की दीवारें ढहा दीं।
हादसे से जन्मी आस्था
साल 1973, जीटी रोड पर एक तेज ट्रक से टकराकर एक हाथी की मौत हो गई। उसके बाद मानो सड़क ने मौत का अड्डा बना लिया। हादसे बढ़े तो लोगों ने माना, ये हाथी की आत्मा का क्रोध है। स्थानीयों ने सहारा लिया महुरू भगत का।
दलित समुदाय से आने वाले इस भगत ने कहा, “यहां हाथी की प्रतिमा बनाइये, मंदिर खड़ा कीजिये।” लोगों ने न सिर्फ मंदिर बनाया बल्कि भगत को ही पुजारी भी नियुक्त किया। यह वो पल था जब जातिगत परंपराओं पर आस्था की जीत हुई। 2004 में जीटी रोड चौड़ीकरण के समय लार्सन एंड टुब्रो ने मंदिर को भव्य रूप दिया। आज यहां दो विशाल हाथियों की प्रतिमायें हैं और साथ ही महुरू भगत की मूर्ति भी। लोग हाथियों और महुरू बाबा दोनों की पूजा करते हैं।
यात्रियों का विश्वास
गांव के कुछ लोग बताते हैं कि “जब से मंदिर बना है, हादसों में कमी आई है। हाथिया बाबा की कृपा से यात्रा सुरक्षित रहती है।” एक ट्रक चालक बोला, “रोज मौत का डर रहता है सड़क पर लेकिन यहां माथा टेकते ही दिल को सुकून और हिम्मत मिलती है।”








