Ranchi : कभी किसी अनजान राह पर मिला एक इंसान जिंदगी भर की सोच बदल सकता है। साल 1994 में हिमालय की ऊंचाइयों पर ब्योर्न स्वेन्सन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। एक हादसे में घायल होकर जब वे चलने की हालत में नहीं थे, तब भारतीय पोर्टर तेनजिंग ने उन्हें अपनी पीठ पर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया। ब्योर्न ने मदद के बदले पैसे देने चाहे, लेकिन तेनजिंग ने लेने से इनकार कर दिया। बस इतना कहा, “That’s not what this is about.” तेनजिंग के ये शब्द ब्योर्न के दिल में ऐसे उतरे कि तीन दशक बाद भी उनकी गूंज बाकी है। अब उसी भावना को लेकर स्वीडन के ब्योर्न स्वेन्सन और उनकी मित्र क्रिस्टीना पाल्टेन लद्दाख से झारखंड के खूंटी तक करीब 2,600 किलोमीटर दौड़ने जा रहे हैं।
30 अगस्त को लेह से शुरू होगी दौड़
‘रन फॉर आशा’ नाम की इस खास मुहिम के तहत दोनों 30 अगस्त 2026 को लेह से दौड़ शुरू करने की योजना बना रहे हैं। करीब तीन महीने तक चलने वाली इस कठिन यात्रा का लक्ष्य नवंबर के अंत तक खूंटी पहुंचना है। यह दौड़ केवल पहाड़ों और रास्तों को पार करने की कोशिश नहीं है। इसके पीछे झारखंड के जरूरतमंद बच्चों और युवाओं के लिये खेल, शिक्षा और जीवन कौशल के बेहतर अवसर जुटाने की मुहिम है।
25 हजार मीटर चढ़ाई, 5,328 मीटर तक ऊंचाई
‘रन फॉर आशा’ सुनने में जितनी खूबसूरत है, रास्ता उतना ही कठिन है। करीब 2,600 किलोमीटर की यात्रा में दोनों धावकों को कुल लगभग 25,000 मीटर की ऊंचाई चढ़नी होगी। शुरुआती करीब 470 किलोमीटर का रास्ता समुद्र तल से 4,000 मीटर से अधिक की औसत ऊंचाई पर होगा। यात्रा के दौरान सबसे ऊंचा पड़ाव करीब 5,328 मीटर की ऊंचाई पर होगा। बर्फीली ठंड, पहाड़ी रास्ते, ऑक्सीजन की कमी और हजारों किलोमीटर की दूरी, हर कदम पर एक नई परीक्षा होगी। लेकिन जब मंजिल किसी अपने के लिये नहीं, बल्कि सैकड़ों बच्चों के भविष्य के लिए हो, तो मुश्किलें भी शायद छोटी लगने लगती हैं।
दोनों धावकों के कदमों में है लंबी दूरी का अनुभव
ब्योर्न स्वेन्सन लंबे समय से लंबी दूरी और पहाड़ी दौड़ से जुड़े रहे हैं। वे 246 किलोमीटर की अल्ट्रामैराथन भी पूरी कर चुके हैं। वहीं क्रिस्टीना पाल्टेन भी कोई साधारण धावक नहीं हैं। उन्होंने अकेले ईरान में 1,840 किलोमीटर और तुर्की से फिनलैंड तक 3,262 किलोमीटर की दौड़ पूरी की है। लंबी दूरी की दौड़ में उनके नाम कई रिकॉर्ड भी दर्ज हैं। अब दोनों का अनुभव एक ऐसी दौड़ में काम आयेगा, जिसकी फिनिश लाइन पर सिर्फ एक पदक नहीं, बल्कि कई बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद खड़ी है।
ब्योर्न का झारखंड से 1994 से रिश्ता
ब्योर्न का झारखंड और खूंटी से जुड़ाव भी पुराना है। ASHA यानी Association for Social and Human Awareness के संस्थापक अजय कुमार जयसवाल के अनुसार, ब्योर्न संस्था से वर्ष 1994 से जुड़े हैं। समय के साथ यह रिश्ता दोस्ती और सेवा की एक साझा सोच में बदलता गया। अब ‘रन फॉर आशा’ उसी रिश्ते को एक नई ऊंचाई देने जा रही है। संस्था का काम जरूरतमंद बच्चों और महिलाओं को सशक्त बनाने पर केंद्रित है। गरीब परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने से लेकर पेंशन और राशन कार्ड जैसी सुविधाओं में मदद की जाती है। जरूरतमंद बच्चों और बच्चियों को हॉस्टल में रखकर आगे की पढ़ाई पूरी करने में भी सहयोग दिया जाता है। रांची के लालखटंगा पंचायत के भूसूर गांव में ASHA का हॉस्टल संचालित है, जबकि सरायकेला में एक सेंटर चल रहा है, जिसकी देखरेख ग्रामसभा करती है।
150 बच्चे जुड़े, बेटियों की संख्या ज्यादा
संस्था के अनुसार, रांची और सरायकेला के सेंटरों से 100 से अधिक बच्चे और बच्चियां इंटर और स्नातक की पढ़ाई पूरी कर आगे बढ़ चुके हैं। फिलहाल दोनों सेंटरों से करीब 150 बच्चे और बच्चियां जुड़े हुए हैं, जिनमें बच्चियों की संख्या अधिक है। खूंटी में भी संस्था का एक सेंटर था, लेकिन कोविड के दौरान फंड की कमी के कारण उसे बंद करना पड़ा। अब ‘रन फॉर आशा’ के जरिए संस्था अपने काम को और मजबूत करने की उम्मीद कर रही है। ब्योर्न ने तीन दशक पहले हिमालय में मदद की कीमत नहीं, इंसानियत की ताकत देखी थी। तेनजिंग ने पैसे नहीं लिये, लेकिन एक ऐसा सबक दे दिया जो आज हजारों किलोमीटर की दौड़ में बदल गया है। अब लेह की ऊंची पहाड़ियों से निकलने वाले दो कदम खूंटी के बच्चों तक पहुंचेंगे। यह दौड़ बताती है कि बदलाव हमेशा बड़ी रकम से नहीं आता। कभी-कभी एक कदम, एक सहयोग और एक छोटी-सी मदद किसी बच्चे की पूरी जिंदगी की दिशा बदल सकती है। यह दौड़ मंजिल तक पहुंचने की नहीं, उम्मीद पहुंचाने की है।







