Khunti : झारखंड की लाल मिट्टी, साल-पाली के पेड़ों से घिरे DCRC सभागार में 13 सितंबर को आदिवासी अस्मिता और स्वशासन का विराट संगम देखने को मिला। यहां आयोजित रूढ़िजन्य जनजाति आदिवासी महासभा में खूंटी, रांची, गुमला, जमशेदपुर, चाईबासा, सरायकेला और लोहरदगा तक के प्रतिनिधि एक साथ जुटे। यह महासभा “जनजातीय आत्मसम्मान का महाकुंभ, जैसा था, जहां हर स्वर संविधान की पांचवी अनुसूची और ग्राम सभा की ताकत के लिये गूंज उठा।” इस सभा में 52 पढ़ा और 22 पड़ा के प्रतिनिधि, राजा, श्री परगना, भेंगरा पढ़ा और खड़िया महासोहोर परगना उपस्थित थे। सभा को सफल बनाने में पाड़ा संयोजक महादेव मुंडा की भूमिका सबसे अहम रही। मुख्य अतिथि के रूप में निशा उरांव (भारत सरकार पंचायती राज विभाग की प्रोग्राम अफसर एवं आयकर आयुक्त, बिहार-झारखंड) उपस्थित रहीं। कार्यक्रम का संचालन खूंटी जिला के अमर बाबू ने किया।
मुख्य बिंदु
सभा में जिन विषयों पर परिचर्चा हुई, वे सीधे आदिवासी जनजीवन और उनके भविष्य से जुड़े थे, जैसे पांचवी अनुसूची में निहित संवैधानिक अधिकार, स्वशासन व्यवस्था में आदिवासी अधिकारों का प्रावधान, ग्राम सभा को संपूर्ण अधिकार प्रदान करने की मांग, पेसा कानून 1996 के 23 प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा एवं उरांव, मुंडा, हो, खड़िया, संथाल सभी जनजातियों के अधिकार व स्वशासन व्यवस्था की जानकारी। मौके पर रूढ़िजन्य जनजाति आदिवासी महासभा अध्यक्ष महादेव मुंडा, संरक्षक निशा उरांव, महासचिव पंचानन सोरेन, सामाजिक कार्यकर्ता विजय कुजूर, ग्राम प्रधान जय मंगल मुंडा, ग्राम प्रधान संघ अध्यक्ष नेट मुंडा, बिरसा उरांव (राजी पढ़ा, लोहरदगा) एवं जलेश्वर उरांव, पूर्णचंद्र मुंडा समेत बड़ी संख्या में प्रतिनिधि मौजूद रहे। महासभा ने साफ संदेश दिया कि “जंगल-जमीन-पानी सिर्फ साधन नहीं, आदिवासियों की पहचान हैं।






