रांची : हम उस देश के वासी हैं, जहां भामाशाह जैसे दानवीर अपना तन, मन और धन सबकुछ दान कर दिया। क्या हम किसी को जिंदगी देने की खातिर कुछ नहीं कर सकते। अगर कर सकते हैं तो जरूर करना चाहिये। रोज लोगों को रोते हुए देखता हूं। अस्पताल में एक बेड के लिए चीखते चिल्लाते देखता हूं। हैरत और ताज्जुब तो तब होती है, जब मंत्री को असहाय पाते हैं। खुद मंत्री मुझे फोन कर बेड दिलाने को गिड़गिड़ाते हैं। तब मैं भी खुद को लाचार और बेबश पाता हूं। धन दौलत, शोहरत कुछ काम नहीं आ रहा। आज की तारीख में हास्पिटल में एक बेड मिल जाना मतलब लॉटरी लग जाना। बेड मिल जाता है तो आक्सीजन नहीं, आक्सीजन मिल जाये तो इंजेक्शन नहीं। कालाबाजारी अलग से। बहुत बुरा हाल है। ऐसा कोई रोज नहीं गुजरता जब बेड दिलाने को फोन नहीं आता। बहुत दुख होता है। मन झकझोर जाता है बेड के दिक्कत में दम तोड़ते लोगों के परिवार की चीख चीत्कार सुनकर। अब सहा नहीं जाता। इस वजह से अपना दो तल्ला मकान को कोविड सेंटर बनाने को तैयार बैठा हूं। जब चाहे शासन प्रशासन मेरा दो तल्ला मकान को कोविड सेंटर बना सकते हैं। मकान पूरी तरह से खाली कर दिया हूं। यहां 40 बेड लगाये जा सकते हैं। आईये सुनते हैं, अपना घर तक को कोविड सेंटर बनाने को तैयार जिगर रखने वाले समाजसेवी अनिल यादव को…
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