Kohramlive : प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहने पर पद से हटाने वाले विवादित विधेयक में अब बड़े बदलाव की तैयारी है। बिल की समीक्षा कर रही संसदीय समिति ने इसमें ‘सनसेट क्लॉज’ यानी एक निश्चित अवधि के बाद प्रावधान स्वतः समाप्त होने की व्यवस्था जोड़ने की सिफारिश की है। समिति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाद में निर्दोष साबित होने वाले जनप्रतिनिधियों को केवल हिरासत के आधार पर हमेशा के लिये पद से बाहर न होना पड़े।
निलंबन की अवधि होगी सीमित
समिति के प्रस्ताव के अनुसार, मंत्री के पद से हटने के बाद, अदालत से बरी होने पर या तय समय सीमा में अभियोजन आगे नहीं बढ़ने पर निलंबन की व्यवस्था स्वतः समाप्त हो जायेगी।इससे ऐसे मंत्री, जिन्हें बाद में न्यायालय निर्दोष घोषित कर दे, दोबारा पद संभालने के योग्य हो सकेंगे।
गंभीर अपराधों की अलग सूची बनाने की सिफारिश
संसदीय समिति ने बिल के दायरे को स्पष्ट करने के लिये गंभीर अपराधों की एक अलग अनुसूची बनाने का सुझाव दिया है। इसके तहत किन अपराधों में यह कानून लागू होगा, यह स्पष्ट होगा। कानून के गलत इस्तेमाल की आशंका कम होगी। संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों से जुड़े मामलों में तेजी से सुनवाई के लिये विशेष या त्वरित अदालतों की व्यवस्था की जा सकेगी।
निर्दोष होने की धारणा कमजोर होने की चिंता
समिति ने माना कि राजनीति में अपराधीकरण रोकने और पारदर्शी शासन के उद्देश्य का समर्थन किया जाना चाहिये, लेकिन इसके लिये मजबूत कानूनी सुरक्षा जरूरी है। समिति के अनुसार, केवल लंबे समय तक हिरासत में रहने के आधार पर संवैधानिक पद से हटाना ‘निर्दोष होने की धारणा’ को प्रभावित कर सकता है। इससे राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ रणनीतिक गिरफ्तारी के दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ सकती है।
कानून में संतुलन बनाने की कोशिश
प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य साफ शासन व्यवस्था और व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन कायम करना है। कई प्रमुख कानून विश्वविद्यालयों और कानूनी संस्थानों ने राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के उद्देश्य का समर्थन किया है, लेकिन 30 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद स्वतः पद से हटाने के प्रावधान पर सवाल उठाये थे। अब समिति की सिफारिशों के बाद यह साफ होगा कि अंतिम कानून में किन बदलावों को शामिल किया जाता है।
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