Palamu(Neeraj Thakur) : पलामू के छत्तरपुर थाना क्षेत्र का देवगन जंगल। तारीख 21 जून 2023। सुबह की नमी में धूप की किरणें जब पेड़ों की ओट से झांक रही थीं, तभी एक चरवाहा कांपती आवाज में चिल्लाया, “साहब… एक लाश है जंगल में।” कुछ ही देर में जंगल की खामोशी पुलिस की सायरन से चीर दी गई। लाश के पास पड़ी थी, एक टूटी घड़ी, जेब में था एक रेलवे टिकट और सीने में थी एक गोली। नाम था- मृत्युंजय साह। बिहार के सिवान से आया एक सीधा-साधा युवक, जो कहकर निकला था, “प्लांट में ड्यूटी है, जल्दी लौटूंगा मां। पर किसी ने नहीं सोचा था, वह लौटेगा, लेकिन ताबूत में बंद होकर। मृत्युंजय का जुर्म यह था कि वो अपने दोस्ते की बीवी से प्यार करता था? अनिता देवी..रूप की रानी और चाल की महारानी। वो उसकी मोहब्बत थी, उसके ख्वाबों की मलिका… लेकिन वो किसी और की पत्नी थी- अमित मेहता की। राजस्थान की तेज धूप में जब दोनों मजदूरी करते थे, वहीं हुआ था इश्क का अंकुरण। कभी लुका-छिपी में फोन कॉल्स… कभी चुपचाप भेजे गये गुलाबों के इमोजी। और एक दिन, मोहब्बत हदें पार कर गई। अमित को भनक लगी और फिर टूटी थी एक मर्द की दुनिया। “तुमने जो मेरा लिया है, उसका हिसाब देना होगा…”अमित ने जहर पी लिया था रिश्तों का। उसने अपनी पत्नी से कहा —”उसे बुलाओ… और इस बार, हमेशा के लिये विदा करो।” अनीता ने नाटकीय मुस्कान के साथ मृत्युंजय को फोन किया, “आओ ना, मिलते हैं… डेहरी स्टेशन पर।” वो आया। फूलों के साथ, दिल के साथ, भरोसे के साथ। वो नहीं जानता था कि…जिसके साथ उसने सपने देखे थे, वही उसे मौत की दहलीज तक ले जायेगी। बस से उतरते ही तीन जोड़ी आंखें उसका पीछा कर रही थीं। जंगल के पास पहुंचते ही बहस शुरू हुई, “तू नहीं मानेगा ना? अब सजा भुगत।” धांय…एक गोली… और टूट गया एक प्रेम कहानी का अंत। पुलिस ने दो साल की तप्तीश, दर्जनों कॉल रिकॉर्ड, और एक गुमनाम चश्मदीद की मदद से इस राज से पर्दा उठा दिया।
इधर, जेल की कोठरी में बैठी अनिता देवी की आंखें आज भी उस शाम को याद कर के डबडबा जाती हैं…”मैंने उसे प्यार किया था… सच्चे दिल से। पर किसे पता था कि प्यार, पाप बन जायेगा।” धीरे-धीरे उसने अपनी कहानी पुलिस अफसर निर्मल कुमार सिंह के सामने खोली, मानो दिल की गिरहें खुल रही हों। “मृत्युंजय से पहली मुलाकात राजस्थान में हुई थी। अमित के साथ था वो। दोनों की दोस्ती पुरानी थी और मेरे जीवन में एक अधूरी मुस्कान भरने वाला था मृत्युंजय।” उसकी आवाज कांप रही थी, पर शब्दों में सच्चाई थी। “अमित को जब हमारे रिश्ते की भनक लगी, तो वो बौखला गया। मैंने लाख मिन्नतें कीं कि छोड़ दो उसे… वो सिर्फ बात करता है, कुछ गलत नहीं किया। पर नहीं… अमित का पुरुष अहंकार तिलमिला उठा।” “अमित बोला – तुम उसे बुलाओ। जैसे पहले बुलाती थी, वैसे। मैं देखता हूं उसका ‘प्यार’। मैं चुप थी… मजबूर थी… और शायद कहीं ना कहीं डर भी रही थी।” अनिता ने गहरी सांस ली…”मैंने मृत्युंजय को फोन किया। कहा कि आओ, मिलते हैं। उसने एक पल भी नहीं लगाया… स्टेशन पर पहुंचा, मुस्कुराता चेहरा लेकर। “वो बार-बार पूछ रहा था – सब ठीक है न? और मैं… मैं जवाब नहीं दे पाई। तभी पीछे से अमित आया… और गूंज गई वो आवाज… वो गोली की आवाज जिसने दो जिंदगियां छीन लीं। एक की सांस और दूसरी की इंसानियत।” उसने पुलिस अफसर की ओर देखा…”मैं मुजरिम हूं। लेकिन सिर्फ कानून की नहीं… अपने उस प्रेम की, जिसे मैंने मौत की दहलीज़ पर बुलाया था।” वहीं, गिरफ्तार अमित मेहता के माथे पर पसीने की बूंदें और आंखों में पछतावे का सैलाब लिये… खुद अपने ही अपराध का हिसाब दे रहा था। “मैंने उसे मारा… हां, मारा। क्योंकि वो मेरे घर की दीवारों में दरारें डाल रहा था। मेरी पत्नी के मन में जहर घोल रहा था। मृत्युंजय मेरा दोस्त था। लेकिन दोस्ती के नाम पर वो मेरे ही जीवन को लूट रहा था। अनिता… मेरी पत्नी… मेरी लाज… वो उसके साथ…” – अमित की आंखों में नफरत की चिंगारी थी। इस नफरत की आग में धधकते अमित बड़ा कांड कर गया।














