Palamu : पलामू के मनातू प्रखंड में वक्त जैसे ठहर गया है। यहां डुमरी चक, सिलदिलिया और आसपास के तीस गांव हैं, जिनके पास स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, मगर वहां न डॉक्टर हैं, न दवा, न उम्मीद। गांवों से निकलकर पांकी या बिहार तक का सफर, 30 से 45 किलोमीटर, मानो जिंदगी और मौत के बीच की पतली डोर बन गया है। सड़कें टूटी हैं, रातें नक्सल साये में हैं, और बीमार होना यहां किसी अभिशाप से कम नहीं। अदोरिया गांव की गर्भवती महिला, जिसे दर्द उठा, मगर सड़क ने साथ नहीं दिया, अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी सांसें थम गईं। जसपुर की चंपा देवी, जिनकी आंखों में अब भी अधूरी उम्मीद झलकती है, इलाज न मिलने से चल बसीं। और बलराम सिंह, जिन्हें बस हल्का बुखार था, पर झोलाछाप के भरोसे जिंदगी ने भी हार मान ली।
कागजों पर सब कुछ है, स्वास्थ्य भवन, ANM, CHO, पर ये सब नाम हैं, निशान नहीं। गांव वाले कहते हैं, “सरकारी दीवारें बनी हैं, पर भीतर कोई नहीं आता।” कभी-कभी कोई स्वास्थ्य कर्मी आता भी है, तो बस खानापूर्ति कर लौट जाता है। रात में अगर कोई बीमार हो जाये, तो गांव का पूरा माहौल सिहर उठता है। ना एंबुलेंस, ना सड़कें, बस अंधेरा और जंगलों की खामोशी। कई बार तो मरीज का शरीर ठंडा पड़ जाता है, इससे पहले कि सुबह की रोशनी उम्मीद लेकर आये। कुछ ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते हैं, नेता हेलिकॉप्टर से उतरते हैं, भाषणों में ‘विकास’ गूंजता है, मगर जब कोई बच्चा बुखार से मरता है, तो उस पर कोई चर्चा नहीं होती। अधिकारी कहते हैं, “सुधार की कोशिश जारी है” —
मगर लोगों की आंखों में अब सिर्फ एक सवाल है, “कब तक?”
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