spot_img

”आत्मनिर्भर भारत के स्वदेशी पथप्रदर्शक थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय”

Date:

spot_img
spot_img
📖भाषा चुनें और खबर सुनें:
🎙️कोहराम LIVE रेडियो

Kohramlive : भारत के वैचारिक आकाश में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम एक ऐसे प्रकाश स्तंभ की तरह चमकता है, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता तक सीमित न रखकर उसे भारतीय जीवन-दर्शन का आधार दिया। उनका एकात्म मानववाद आज के ‘आत्मनिर्भर भारत’ का वैचारिक शिलान्यास है, जहां व्यक्ति, समाज और राष्ट्र एक सूत्र में बंधकर विकास की ओर अग्रसर होते हैं। साम्यवाद और पूंजीवाद की जद्दोजहद के बीच उपाध्याय जी ने एकात्म मानववाद का सूत्र दिया। यह न पूंजीवाद की तरह स्वार्थी उपभोक्ता बनाता है, न ही साम्यवाद की तरह व्यक्ति को समाज में विलीन करता है। यह मानव को शरीर, बुद्धि, आत्मा और संस्कारों का संपूर्ण रूप मानता है। उनका स्पष्ट मत था, “भारत का मार्ग न पूंजीवाद है, न साम्यवाद; भारत का मार्ग एकात्म मानववाद है।”

अंत्योदय, विकास का अंतिम छोर

उपाध्याय जी का मानना था कि लोकतंत्र की असली कसौटी समाज के अंतिम व्यक्ति की शक्ति है। यही सोच अंत्योदय की अवधारणा में प्रकट होती है। उनके अनुसार विकास का पैमाना बड़े उद्योगों का उत्पादन नहीं, बल्कि सबसे गरीब और वंचित व्यक्ति का उत्थान होना चाहिए। यही विचार आज आत्मनिर्भर भारत की योजनाओं और कल्याणकारी नीतियों में झलकता है। उन्होंने ग्रामोद्योग और कुटीर उद्योगों को भारत की रीढ़ माना। उपाध्याय जी का संदेश था कि विदेशी पूंजी पर आश्रित रहकर आत्मनिर्भरता संभव नहीं। उनका स्वदेशी मंत्र आज मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल की भावना में स्पष्ट दिखता है। पंडित जी ने कहा कि पंचवर्षीय योजनायें तभी सफल होंगी जब वे भारतीय समाज और संस्कृति की आवश्यकताओं से मेल खायें। उनका उद्देश्य मात्र उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि समान अवसर और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना होना चाहिये। उपाध्याय जी का मानना था कि केवल सरकार के भरोसे आत्मनिर्भर समाज नहीं बन सकता। स्वयंसेवी संगठनों, जनता की सहभागिता और धन की नैतिकता को वे विकास का अनिवार्य आधार मानते थे। उनका दृष्टिकोण आज की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) की वैचारिक नींव है।

भाषा और संस्कृति का सम्मान

राष्ट्र की एकता के लिये उन्होंने हिन्दी को संपर्क भाषा माना, पर क्षेत्रीय भाषाओं का भी सम्मान किया। उनका विश्वास था कि स्वदेशी शिक्षा और मातृभाषा का विकास ही सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता की पहचान है। भारतीय जनसंघ के महामंत्री और अध्यक्ष रहते हुये उन्होंने राजनीति को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जोड़ा। उनकी घोषणा,“एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” आगे चलकर अनुच्छेद 370 को हटाने की प्रेरणा बनी।

महाप्रयाण और अमर विरासत

11 फरवरी 1968 को मुगलसराय स्टेशन पर रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हुआ। मात्र 51 वर्ष की आयु में देहांत के बावजूद उनका दर्शन आज भी आत्मनिर्भर भारत की राह को दिशा देता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने हमें सिखाया कि सच्चा विकास अपनी जड़ों से जुड़े बिना संभव नहीं। उनकी जयंती पर यही संकल्प होना चाहिये कि आत्मनिर्भर भारत को व्यवहार में उतारें, स्वदेशी को जीवन का हिस्सा बनायें और अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुँचाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और भारत को विश्वगुरु बनाने का वास्तविक मार्ग भी। यह कहना है डॉ. प्रदीप कुमार वर्मा (सांसद (राज्यसभा), भारतीय जनता पार्टी) का।

 

spot_img
spot_img
spot_img

Related articles:

CM के निर्देश का असर, तमिलनाडु से 42 प्रवासी श्रमिक हुये रवाना

Ranchi : तमिलनाडु के तिरुवल्लूर में अमोनिया गैस रिसाव...

‘नन्हा सा दिल’ अभियान शुरु, 5,064 बच्चों की हुई हृदय जांच

Hazaribagh(Krishna Paswan) : हजारीबाग के चौपारण प्रखंड में मंगलवार...

जंगल और नदी किनारे चल रहा था अवैध कारोबार, पुलिस ने किया ध्वस्त…

Hazaribagh(Krishna Paswan) : हजारीबाग में अवैध शराब के खिलाफ...

“मैंने अपनी बहन को मार दिया है, श’व घर में पड़ा है”

UP : मेरठ में रिश्तों को शर्मसार कर देने...

DIG को कॉल कर CM को उड़ाने की धमकी, फिर मची खलबली…

UP : उत्तर प्रदेश में बीती देर रात मुख्यमंत्री...