“पल-पल दिल के पास…” धर्मेंद्र अब देह नहीं, लेकिन…

Date:

spot_img
📖भाषा चुनें और खबर सुनें:
🎙️कोहराम LIVE रेडियो

Kohramlive : भारतवर्ष की स्मृतियों के धरा-धाम में जब कोई अद्वितीय विभूति चली जाती है, तो समय एक पल को रुक जाता है और भावनायें अपना सारा भार दिल पर रख देती हैं। 89 वर्ष की आयु में धर्मेंद्र का पंचतत्व में विलीन होना, सिर्फ एक सितारे का बुझना नहीं, बल्कि एक ऐसे मनुष्य का जाना है, जो अपने भीतर एक पूरा दौर संजोये था, उस दौर की खुशबू, उसके किस्से, उसका अपनापन। गीतकार राजेंद्र कृष्ण की वह पंक्ति, “पल-पल दिल के पास…” आज धर्मेंद्र का पर्याय-सा लगता है। शायद किस्मत ने ही यह अनोखा बंधन बुना था, शब्दों के जादूगर और सादगी के सम्राट के बीच  दोनों ही लोगों की रगों में समा जाने वाले। सिनेमा की चमक-दमक में, जहां करियर अक्सर लोगों को मदहोश कर देता है, धर्मेंद्र एक बरगद की तरह खड़े रहे, विशाल, स्थिर, और लोगों को छांह देने वाले। अपने बेटों सनी और बॉबी की तरह उन्होंने पौरुष की अलग परिभाषा लिखी, साहस हो, तो सौम्यता भी हो, शक्ति हो, तो संवेदना भी।

टीवी पर एक इंटरव्यू में जब उन्होंने मुस्कुराते हुये कहा, “शत्रुघ्न सिन्हा मेरा बीरबल है, इंडस्ट्री मुझे प्यार करती है, लेकिन शत्रु इज माई डार्लिंग।” ये शब्द जो दोस्ती को रुतबे से ऊपर रखता था। यह वह पंक्ति है जो धर्मेंद्र के व्यक्तित्व को अमर करती है। उन्होंने कहा था, “60 साल हो गये इंडस्ट्री में, पर मेरे अंदर से साहनेवाल का धर्मेंद्र नहीं जाता। वही मुझे गिरने नहीं देता, मेरी आत्मा में रचे कच्चे रास्तों की धूल मुझे संभाल लेती है।” चौथी कक्षा के दिनों का स्मरण, ननिहाल, इज्जतदार परिवार और मां का प्यार भरा ताना, “मरजाणे, तुझे तो किसी अमीर के घर पैदा होना चाहिए था!” और बालक धर्मेंद्र का जवाब, “दे दो किसी को…” यह बच्चा ही भविष्य का ‘ही-मैन’ था।  धर्मेंद्र ने बताया था कि उनके जमाने में साधन नहीं थे, लेकिन जज्बा था। एक दिन में 50 मील साइक्लिंग, कई घंटों तक कुयें से बाल्टी भरना, मवेशियों के लिये हरा चारा काटना ये सब उन्हें सिर्फ मजबूत ही नहीं, अडिग बनाते थे।

अपनी लेखनी से लिखा सपना

देश के बंटवारे के बाद, नौवीं क्लास में उन्होंने शहीद फिल्म देखी और दिल में एक आग जल उठी। उस आग ने उन्हें लिखवा दिया, नौकरी करता, साइकल पर आता-जाता फिल्मी पोस्टर्स में अपनी झलक ढूंढता, रात को जागकर ख्वाब बुनता, सुबह आइने से पूछता, “क्या मैं दिलीप कुमार बन सकता हूं?” और फिर नियति मुस्कुराई, उसे उसकी मंजिल मिल गई। प्रेम, सादगी और इंसानियत का अक्षय दीप धर्मेंद्र से यही सीख लें, प्रेम बांटना कभी बंद मत करो, सादगी को गहना बनाओ और जड़ों की सुगंध को अपने भीतर संभालकर रखो। क्योंकि धर्मेंद्र देह छोड़ गये हैं, पर “पल-पल दिल के पास” रहेंगे।

spot_img
spot_img
spot_img

Related articles:

PM ने 51 हजार युवाओं को दिया तोहफा… जानें क्या

Delhi : देश के लाखों युवाओं के लिए शनिवार...

राजधानी रांची में कई और थानेदारों का तबादला… देखें लिस्ट

 Ranchi : राजधानी रांची पुलिस में कई और थानेदारों का...

पेट्रोल-डीजल फिर महंगा, इतने बढ़ गये दाम… जानें

Kohramlive : देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों...

रांची में 15 पुलिस अधिकारी इधर से उधर… देखें लिस्ट

Ranchi : राजधानी रांची में 15 पुलिस अधिकारियों को...

नहाते ही बदन पर रेंगते हैं छोटे-छोटे कीड़े… देखें वीडियो

Ranchi(Akhilesh Kumar) : रांची से सटे नामकुम के लालखटंगा...