Kohramlive : 87 की उम्र में खुद को ‘न्यू-कमर’ बताने वाला वो ही-मैन अब चला गया, पर पीछे छोड़ गया जिंदगी के वो फलसफे जो आज भी दिलों को आईना दिखाते हैं। सिनेमा का वो सितारा, जिसने शोहरत को अपनी हथेलियों की लकीरों जैसा देखा था, धर्मेंद्र, आज हमारे बीच नहीं हैं। पर उनके शब्द, उनकी सीख, उनका अपनापन, हमेशा रहेगा, मानो किसी दीपक की लौ, जो तूफानों में भी नहीं बुझती। वो जानते थे कि शोहरत चढ़ती है, उतर भी जाती है। पर इंसान की कीमत उसके दिल से होती है, उसकी नीयत से होती है। इस चमकती–दमकती फिल्मी दुनिया में उन्होंने पीढ़ियों को आसमान दिया, एक बरगद की छांव की तरह, जिनके नीचे न जाने कितने सितारे पनपे, न जाने कितने सपनों को उड़ान मिली।
अमिताभ बच्चन से धर्मेंद्र का अनोखा रिश्ता
धर्मेंद्र के जीवन में एक किस्सा बेहद दिलचस्प, एक ऐसा किस्सा जिसमें नसीब, परिवार और दोस्ती, तीनों की परीक्षा हुई। उन्होंने बताया था कि 17,500 रुपये में उन्होंने वह स्क्रिप्ट खरीदी थी जो बाद में अमिताभ बच्चन के करियर की दिशा बदलने वाली थी। पर बहन की कसम भारी पड़ी, उन्होंने स्क्रिप्ट प्रकाश मेहरा को दे दी। फिल्म उन्होंने नहीं की। इसका मलाल दिल में जरूर रहा, पर खुशी भी, क्योंकि जिसे तकदीर लिखकर देती है, वो वहीं जाता है। बाद में अमिताभ खुद कहते थे “ये फिल्म मुझे नसीब से मिली है।” और ये भी रोचक ये रोल पहले शत्रुघ्न सिन्हा के पास जाने वाला था।
धर्मेंद्र ने युवाओं को दिये ये गुरुमंत्र
धर्मेंद्र केवल स्टार नहीं थे, दिलों के फलसफी थे। उनके शब्दों में जिंदगी चमकती थी, जैसे किसी कवि की चुप्पी भी कविता बन जाये। ”आवाज-ए-खल्क नक्कार-ए-खुदा होती है “लोगों की आवाज, वही असली भगवान की आवाज है। ”खिदमत-ए-खल्क भी नक्कार-ए-खुदा होती है” लोगों की सेवा करना, सबसे बड़ा धर्म है। ”शोहरत तो नशा है साहब, चढ़ता भी है, उतरता भी है। ”मोहब्बत एक ऐसा जज्बा है जो दिलों में हमेशा घर कर जाता है”। ‘ये धर्मेंद्र का असली ‘अंदाज’ था, सादा, सौम्य, सच्चा। वहीं, धर्मेद्र कहा करते थे कि ईगो एक संक्रामक बीमारी है, एक को हो जाये तो दूसरे को भी झट से लग जाती है। आज की पीढ़ी के लिये ये सबसे अहम सीख। ”सबकुछ पाकर हासिल-ए-जिंदगी कुछ भी नहीं…मैंने देखे हैं सिकंदर… खाली हाथ जाते हुये। मैंने देखे हैं तैराक… गहरे पानी में डूबते हुये।” ये पंक्तियां फलसफा नहीं, समूची जिंदगी का निचोड़ हैं।
जिसे धर्मेंद्र ने बिना डरे बताया
धर्मेंद्र ने कहा था, “जां पे खेल जाने के इरादे अभी बाकी हैं…” यानी जीवन में हिम्मत कभी खत्म नहीं होती। उम्र चाहे 20 की हो या 87 की, इरादे जिंदा रहने चाहिये। यह संदेश आज की युवा पीढ़ी के लिये किसी वरदान से कम नहीं। धर्मेंद्र चले गये पर उनकी बातें, उनके संवाद, उनके गुरुमंत्र आज भी हवा में तैरते हैं। वो ही-मैन सिर्फ पर्दे का नहीं था, वो दिलों का भी था और दिलों में बसने वाले लोग कभी मरते नहीं।






