Ranchi : राजधानी रांची से सटे बेड़ो की मिट्टी, वही मिट्टी जिसने पानी के कणों से इतिहास लिखा, आज एक और दास्तां की गवाह बनी। गांव के चौपाल में जब पद्मश्री सिमोन उरांव का नाम आया, तो लोगों की आंखें नम हो गईं। कहा गया, “बाबा अब चल नहीं पाते, उनकी राह बहुत कठिन हो गई है।” जनता दरबार में यह सुनकर रांची के DC मंजुनाथ भजन्त्री की आंखों में चिंता तैर गई। उनकी आवाज में वही गर्मजोशी थी, “बाबा समाज का गौरव हैं, उनकी तकलीफ हमारी तकलीफ है।” तुरंत आदेश निकला और प्रशासन की टीम बेड़ो की ओर निकल पड़ी।
ट्राइसाईकिल एक सहारा, एक आस
संध्या ढल रही थी। बेड़ो की मिट्टी पर सरकारी गाड़ी रुकी। अधिकारी उतरे, और हाथों में एक साधारण-सी ट्राइसाईकिल थी। पर वह साधारण कहां थी? यह तो बुढ़ापे की थकी राहों को सहारा देने वाली नई सुबह थी। सिमोन उरांव की आंखें छलक पड़ीं। हाथ जोड़े, आवाज कांपी, “यह उपहार नहीं, मेरे लिये जीवनदान है। मैं जिला प्रशासन और राज्य सरकार को दिल से प्रणाम करता हूं।” गांव के बच्चे ताली बजा उठे, और बुज़ुर्गों की आंखों में संतोष झलक आया। यह केवल ट्राइसाईकिल की कहानी नहीं थी, यह उस मिट्टी की कहानी थी, जिसने जल को रोका, गांवों को बचाया और आज सरकार ने उसी मिट्टी के बेटे को नई राह दी।








