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जातिगत जनगणना एक नई शुरुआत…

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Kohramlive : भारत में जातिगत जनगणना की चर्चा एक बार फिर गरमा चुकी है। 1931 के बाद यह पहला मौका है, जब देश के हर नागरिक की जाति के आधार पर आंकड़े जुटाये जायेंगे। 1881 से चल रही जनगणना प्रक्रिया में अब तक केवल अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आंकड़े प्रकाशित होते रहे हैं, लेकिन अब मोदी सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया है और अगले जनगणना के साथ ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियों) और अन्य जातियों का भी हिसाब लिया जायेगा।

क्या है जातिगत जनगणना?

जातिगत जनगणना का मतलब है, हर नागरिक की जाति का डेटा इकट्ठा करना। यह जानने का प्रयास है कि समाज के विभिन्न वर्गों में कितने लोग हैं और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है। जब से भारत स्वतंत्र हुआ है, जातिगत आंकड़े केवल SC/ST तक सीमित रहे हैं, जबकि OBC (अन्य पिछड़ी जातियाँ) की गिनती के लिये आज तक कोई ठोस आंकड़े नहीं जुटाये गये थे।

इतिहास और जरूरी बदलाव

भारत में जाति आधारित आंकड़े 1931 तक हर जनगणना में जारी होते रहे, लेकिन इसके बाद से जाति की गिनती बंद कर दी गई। इसके बाद, 1951 में आज़ादी के बाद हुई जनगणना में सिर्फ एससी और एसटी की संख्या ही सामने आई। बाकी के समाज के लिये कोई ठोस आंकड़े नहीं थे। इस बीच, 1990 के दशक में मंडल कमीशन की सिफारिशों के तहत ओबीसी को आरक्षण मिलने का रास्ता तो खुला, लेकिन तब भी आधार 1931 की जनगणना ही था, जो अब प्रासंगिक नहीं था।

जातिगत जनगणना की आवश्यकता क्यों?

आधिकारिक आंकड़े न होने की वजह से यह जानना मुश्किल था कि ओबीसी और अन्य जातियों की सटीक संख्या क्या है। इसके बिना सरकार यह निर्धारित नहीं कर पाई कि आरक्षण की सीमा कितनी होनी चाहिए, या कौन सी जाति और वर्ग किस क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जातिगत जनगणना होती है, तो हम सटीक आंकड़े पा सकेंगे, और यह समाज की असल स्थिति को सामने लायेगा। वहीं, इसका फायदा यह होगा कि सरकार को यह समझने में मदद मिलेगी कि किस वर्ग के लिये कौन सी योजना बनाई जाये, और उनकी सामाजिक, आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये किस दिशा में काम किया जाये।

आगे की राह: समर्थन और विरोध

जातिगत जनगणना का समर्थन करने वाले कहते हैं कि यह एक ऐतिहासिक कदम होगा। यह जानने से मदद मिलेगी कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में किस वर्ग को सबसे अधिक मदद की जरूरत है। इसके जरिए उन वर्गों को ताकतवर बनाने की योजनाएं बनाई जा सकती हैं, जिनका अब तक सही से आंकलन नहीं हो पाया। वहीं, इसके विरोधियों का कहना है कि इस तरह की गिनती से समाज में जातीय आधार पर और अधिक खाई पैदा हो सकती है। उनका मानना है कि इससे जातिवाद को बढ़ावा मिलेगा और सामाजिक तनाव पैदा हो सकता है। वे इसे एक सियासी चाल मानते हैं, जिससे चुनावी लाभ उठाया जा सकता है।

सियासी पंख

जातिगत जनगणना का मुद्दा सियासी दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हो गया है। बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसकी घोषणा ने इस मुद्दे को और भी गर्म कर दिया है। यह सिर्फ एक सांस्कृतिक या सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति बन चुका है। इसे लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने पहले ही सरकार से सवाल उठाने शुरू कर दिये हैं, जबकि बीजेपी इसे अपनी उपलब्धि मानते हुये इसे समर्थन कर रही है।

क्या होगा असर?

जातिगत जनगणना से केवल आंकड़े ही नहीं, बल्कि भविष्य की योजनाओं का रूप भी तय होगा। अगर सरकार सही तरीके से इन आंकड़ों का इस्तेमाल करती है, तो यह देश में जातिवाद को खत्म करने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकता है। लेकिन अगर यह आंकड़े गलत हाथों में चले गए, तो यह समाज में और भी अधिक बंटवारा और तनाव पैदा कर सकता है। समझने की बात यह है कि इस निर्णय के बाद, जातिगत आरक्षण के दायरे में बदलाव हो सकता है और ओबीसी वर्ग के लिये योजनाओं में भी सुधार की संभावना है।

 

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