हजारीबाग डिटेंशन सेंटर में बांग्लादेशी महिला से दु’ष्कर्म, 3 पुलिसकर्मी सस्पेंड…

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Hazaribagh : हजारीबाग के डिटेंशन सेंटर में रह रही एक बांग्लादेशी महिला ने तीन पुलिसकर्मियों पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है। मामले में तीनों पुलिसकर्मियों को निलंबित कर उनके खिलाफ FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई है। यह जानकारी राज्य सरकार की ओर से झारखंड हाईकोर्ट में दी गई। मामले की सुनवाई जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ में हुई। कोर्ट के निर्देश पर जिला विधिक सेवा प्राधिकार (DLSA), हजारीबाग की टीम ने महिला का बयान दर्ज किया था और अपनी रिपोर्ट अदालत में सीलबंद लिफाफे में पेश की। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मामले को एक NGO ने हाईकोर्ट के सामने उठाया था। NGO की ओर से हाईकोर्ट के अधिवक्ता अंकित अपूर्व ने रिट याचिका दाखिल की। अधिवक्ता के मुताबिक, महिला अपनी सजा पूरी करने के बावजूद लंबे समय से कभी जेल तो कभी डिटेंशन सेंटर में रखी गई थी। महिला ने उनसे बातचीत के दौरान एक पुलिसकर्मी पर शारीरिक शोषण का आरोप लगाया था। इसके बाद कोर्ट ने JHALSA सचिव को ऑनलाइन निर्देश दिया कि DLSA की टीम डिटेंशन सेंटर जाकर महिला का बयान दर्ज करे। DLSA की टीम के सामने महिला ने आरोप लगाया कि तीन पुलिसकर्मियों ने उसके साथ दुष्कर्म किया। इधर, मामले की गंभीरता को देखते हुये प्रशासन ने डिटेंशन सेंटर में महिला की सुरक्षा बढ़ा दी है। तीन महिला और तीन पुरुष कांस्टेबल तैनात किये गये हैं। कोर्ट ने पीड़िता को आवश्यक बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने और उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिये हैं। मामले की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर को होगी।

तीन कांस्टेबलों पर FIR, किये गये सस्पेंड

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि मामले में हजारीबाग के कांस्टेबल रंजीत महतो, रेनू बेंजामिन और वारिस कच्छप के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। तीनों को निलंबित भी कर दिया गया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने FIR में आरोपियों के खिलाफ लगाई गई धाराओं को लेकर भी सवाल उठाया। इस पर महाधिवक्ता रोहिताश्य राय ने अदालत को बताया कि FIR में आवश्यक संशोधन किया जायेगा। सुनवाई के दौरान झारखंड की गृह सचिव वंदना दादर भी अदालत में मौजूद थीं। अधिवक्ता के अनुसार, गृह सचिव ने कोर्ट को बताया कि हजारीबाग का डिटेंशन सेंटर उनके विभाग के अधीन नहीं, बल्कि जिला पुलिस के अधीन है। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब पुलिस गृह विभाग के अधीन आती है, तो डिटेंशन सेंटर में रहने वाली महिला की सुरक्षा और वहां हुई किसी घटना की जिम्मेदारी से सरकार कैसे अलग हो सकती है? कोर्ट ने पीड़िता की सुरक्षा और जरूरी बुनियादी सुविधायें सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया है।

2021 में सजा पूरी, फिर भी क्यों नहीं हुई डिपोर्ट?

मामले में हाईकोर्ट ने एक और बेहद अहम सवाल उठाया। कोर्ट ने पूछा कि जब महिला को 2021 में विदेशी घोषित कर तीन साल की सजा पूरी हो चुकी थी, तो उसे इसके बाद बांग्लादेश क्यों नहीं भेजा गया? महिला को डिटेंशन सेंटर में रखने की जरूरत क्यों पड़ी? राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि महिला को डिपोर्ट करने के लिये केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखा गया था, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला। अब इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को जवाब देना है। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि जब महिला पहले ही Foreigners Act के मामले में सजा काट चुकी थी, तो 2025 में उसी कानून के तहत उसके खिलाफ दोबारा केस क्यों दर्ज किया गया? बताया गया कि महिला वर्ष 2025 के अंत में डिटेंशन सेंटर से भाग गई थी। इसके बाद उसके खिलाफ Foreigners Act के तहत नया मामला दर्ज किया गया। वर्ष 2026 में इस मामले में महिला को अदालत ने बरी कर दिया। हाईकोर्ट ने सवाल किया कि सरकार ने बरी किये जाने के आदेश को चुनौती देने के लिये अपील क्यों नहीं की।

2018 में दर्ज हुये थे दो मामले

राज्य सरकार के अनुसार, महिला के खिलाफ 2018 में दो मामले दर्ज हुये थे। इनमें एक मामला बच्चे के अपहरण से संबंधित था, जबकि दूसरा Foreigners Act के तहत दर्ज किया गया था। बच्चे के अपहरण के मामले में उसे दो साल की सजा हुई थी। इसके बाद Foreigners Act के मामले में वर्ष 2021 में तीन साल की सजा सुनाई गई और उसे हजारीबाग डिटेंशन सेंटर भेजा गया था। अधिवक्ता के अनुसार, महिला के दस्तावेजों और पहचान को लेकर भी पुलिस जांच में अलग-अलग दावे सामने आये हैं। पुलिस का कहना है कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार कराने के मामले में महिला के पति को भी एक मामले में आरोपी बनाया गया था।

 

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