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जेल से बाहर आये आनंद बोले, “जो होगा, वह भी अच्छा होगा”

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Saharsha : ‘जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा होगा।’ यह बोल है आज जेल से पैरोल पर बाहर आये सजायाफ्ता बाहुबली पूर्व सांसद आनंद मोहन का। वो 15 दिनों के पैरोल पर जेल से बाहर आये हैं। मीडिया से कहा कि “शुभ काम के लिये जेल से बाहर आये हैं, प्रायोजन क्या है, सबको पता है। सबको आजादी अच्छी लगती है, जितने दिन बाहर रहूंगा समर्थकों और सभी से अपील है मेरा साथ दें। ये अस्थाई मुक्ति है, इसमें बहुत कुछ बंधा हुआ है।” आनंद मोहन के जेल से बाहर आते ही उन्हें उनके समर्थकों ने घेर लिया। वो 2007 से सहरसा जेल में बंद थे। करीब 15 साल से जेल में बंद आनंद मोहन को पहली बार पैरोल मिली है। उन्होंने पैरोल पर रिहाई के लिये कोर्ट में अर्जी दी थी। वो अपनी बेटी की सगाई में शामिल होना चाहते हैं, वहीं अपनी मां को देखना और उनसे मिलने को बेताब हैं। गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया हत्याकांड में आनंद मोहन को सजा सुनाई गई है। 5 दिसम्बर 1994 में गोपालगंज में हिंसक भीड़ में जिलाधिकारी जी कृष्णैया की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। इस भीड़ की अगुवाई आनंद मोहन कर रहे थे। इस वारदात से एक दिन पहले यानी  4 दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में आनंद मोहन की पार्टी (बिहार पीपुल्स पार्टी) के नेता रहे छोटन शुक्ला की हत्या हुई कर दी गई थी। मारे गये छोटन शुक्ला की लाश के साथ रोड पर प्रदर्शन किया जा रहा था। तभी मुजफ्फरपुर के रास्ते हाजीपुर में मीटिंग कर गोपालगंज वापस जा रहे डीएम जी. कृष्णैया पर भीड़ ने खबड़ा गांव के पास हमला कर दिया। मॉब लिंचिंग और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बीच डीएम की हत्या कर दी गई। हादसे के समय जी. कृष्णैया की आयु 35 साल के करीब थी। इस मामले में निचली अदालत ने 2007 में उन्हें मौत की सजा सुनाई थी। कहते हैं कि आनंद मोहन देश के पहले पूर्व सांसद और पूर्व विधायक हुए, जिन्हें मौत की सजा मिली थी। हालांकि, दिसंबर 2008 में पटना हाईकोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी जुलाई 2012 में पटना हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कभी बिहार की राजनीति में आनंद मोहन का एक अलग नाम था। 1980 के दशक में आनंद मोहन का अलग जलवा और जलजला था। बिहार के कुछ जिलों में उनकी हुकुमत चलती थी। कई बड़ी हस्ती उनके आगे नतमस्तर रहा करती थी। बिहार में सियासत भी अपने अलग तरीके से पटकथा लिखती रही है। सूत्र बताते हैं कि आनंद मोहन ने जेल में गीता खूब पढ़े।

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