अमृतसर में ही मिल गया था म्यूनिख का बोर्डिंग पास
नागरिक उड्डयन मंत्रालय के नोटिस के हवाले से मीडिया में आई खबर के मुताबिक, तीनों यात्री एयर इंडिया के हब-एंड-स्पोक अरेंजमेंट के तहत सफर कर रहे थे। इस व्यवस्था में छोटे एयरपोर्ट से यात्रियों को पहले बड़े एयरपोर्ट तक पहुंचाया जाता है, जहां से वे अंतरराष्ट्रीय उड़ान पकड़ते हैं। तीनों यात्री अमृतसर से दिल्ली आये थे। उन्हें एयर इंडिया की उड़ान के लिये डोमेस्टिक बोर्डिंग पास दिया गया था। लेकिन अमृतसर में ही उन्हें म्यूनिख जाने वाली लुफ्थांसा की फ्लाइट का बोर्डिंग पास भी जारी कर दिया गया। यहीं से पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गये।
इमिग्रेशन चेकपॉइंट तक पहुंचे ही नहीं
मंत्रालय के अनुसार, दिल्ली पहुंचने के बाद इन यात्रियों की पहचान अंतरराष्ट्रीय यात्रा करने वाले यात्रियों के रूप में होनी चाहिये थी। उन्हें घरेलू यात्री प्रवाह से इमिग्रेशन प्रक्रिया की ओर भेजा जाना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यात्री गेट 39 से इंटरनेशनल-टू-इंटरनेशनल ट्रांसफर एरिया में चले गये। इसके बाद वे डिपार्चर एरिया तक पहुंच गये और इमिग्रेशन चेकपॉइंट से गुजरे बिना ही लुफ्थांसा की फ्लाइट में सवार हो गये।
मंत्रालय ने एयर इंडिया से पूछे कई सवाल
इस मामले में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने एयर इंडिया से कई अहम सवाल पूछे हैं।
- यात्रियों को इंटरनेशनल ट्रांसफर क्षेत्र में जाने की अनुमति कैसे मिली?
- अमृतसर में लुफ्थांसा के बोर्डिंग पास क्यों जारी किये गये?
- एयर इंडिया और SATS के कर्मचारियों की इस पूरी प्रक्रिया में क्या भूमिका रही?
- नोडल अधिकारी और मॉनिटरिंग टीम की क्या भूमिका थी?
- यात्रियों के रिकॉर्ड की सही तरीके से जांच क्यों नहीं हुई?
मंत्रालय ने इन सभी बिंदुओं पर एयरलाइन से जवाब मांगा है।
मैनुअल रिकंसिलिएशन में खुली पूरी गड़बड़ी
बताया गया है कि यह मामला बाद में मैनुअल रिकंसिलिएशन के दौरान सामने आया। यानी सिस्टम स्तर पर हुई चूक का पता यात्रियों के रिकॉर्ड का मिलान करने के बाद चला। अब मंत्रालय इस पूरे मामले में यह जानना चाहता है कि गलती सिर्फ बोर्डिंग पास जारी करने तक सीमित थी या एयरपोर्ट पर यात्रियों की आवाजाही और निगरानी में भी गंभीर खामी रही।




